गुरुवार, 17 जून 2021

मध्य मार्ग कोई नहीं - -

जब अंधकार हो पूर्ण मुखर, खुल जाते
हैं अपने आप बंद आँखों के द्वार,
खिड़कियां हैं खुली अबूझ हवा
पलट रही है एक ही पृष्ठ
को हज़ार बार, सहेज
कर जितना भी
रखें बिखर
जाती
हैं पुरातन स्मृतियां, बेवजह हम दौड़े
चले जा रहे हैं अंधी गुफाओं के
अंदर, समय मिटा चुका
है कब से, सभी शैल
आकृतियां, कभी
था यहाँ कोई
समुद्र तो
रहा
होगा, सम्प्रति कुछ भी नहीं सिवा -
धूसर इतिहास के, कभी नीबू
फूल के गंध में डूब कर,
गहन रात ने चाहा
था उम्र भर का
जुर्माना,
कभी
वो गुज़रते रहे बहुत क़रीब से बिना
किसी आहट ओ एहसास के,  
उजाले का उतरन ओढ़
कर उतर रही है ये
ज़िन्दगी, या
सुबह के
पांव
तले अभी तक है अंधेरे की सीढ़ियां,
सुदूर है समुद्र का विस्तृत मुहाना,
पीछे दौड़ती चली आ रही है
विक्षिप्त सी एक नदी,
मध्य मार्ग है एक
मिथक, टूटती
नहीं कभी
पांवों
की बेड़ियाँ - -

* *
- - शांतनु सान्याल  


  

14 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर।🌻
    समय जैसे जैसे बीतता हैं पुराने दिन याद आने लग जाते है मानो कितने अच्छे थे वो दिन भले ही उस समय को हमने सही से न जिया हो और कोसा खूब हो। समय के साथ सब बदल जाता है पर दुख अपनो से बिछड़ने का होता है..

    जवाब देंहटाएं
  2. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (18-06-2021) को "बहारों के चार पल'" (चर्चा अंक- 4099) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह क्या बात है ।
    सबसे पहले तो इस सुंदर ब्लाग के लिए आपको बधाई ।
    रचना का आनंद अलग ।

    सादर

    जवाब देंहटाएं
  4. गुज़रते रहे बहुत क़रीब से बिना
    किसी आहट ओ एहसास के,
    उजाले का उतरन ओढ़...बहुत ही सुंदर सृजन गहनता की अथाह गहराई लिए।
    बार बार पढ़ने को आतुर करता।
    हार्दिक बधाई आदरणीय सर।
    सादर

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