तमाम रात बढ़ता रहा मृत्यु जुलूस, दबी
सिसकियों का लेकिन मिलता नहीं
कोई हिसाब, कुछ चेहरे थे
अर्थहीन, कुछ रिश्तों
के ज़िल्द सूखे
पत्तों की
तरह
अपने आप ही झर गए, उपग्रह की आँखों
में धूल झोंकना नहीं आसान, असंख्य
लोग हैं भस्म के नीचे, चिताओं
में वो जले ज़रूर, मर्त्य -
लोक से आख़िर, वो
गए किधर, आज
नहीं तो कल
ये राज़
खुलेंगे नक़ाब दर नक़ाब, दबी सिसकियों
का लेकिन मिलता नहीं कोई हिसाब।
हम सभी हैं राजपथ के विकलांग
तमाशबीन, चेतनाशून्य हो
कर हमने किया था
जयघोष, जब
ज़मीं से
चीर
कर निकलने लगे गुप्त दुर्गन्ध, तब हमें
आया है होश, मिथकों से मुक्ति नहीं
संभव, हर एक पुरोधा यहाँ लिखता
है अपने आप इतिहास की
झूठी किताब, इस
बनावटी दौर
में सब से
सहज
है स्वयंभू देवदूत बन जाना जनाब, दबी
सिसकियों का लेकिन मिलता नहीं
कोई हिसाब।
* *
- - शांतनु सान्याल

असंख्य लोग हैं भस्म के नीचे, चिताओं
जवाब देंहटाएंमें वो जले ज़रूर, मर्त्य -
लोक से आख़िर, वो
गए किधर, आज
नहीं तो कल
ये राज़
खुलेंगे नक़ाब दर नक़ाब, दबी सिसकियों
का लेकिन मिलता नहीं कोई हिसाब
सही कहा राज तो खुलेंगे जरूर खुलेंगे पर इतिहास की झूठी किताब तब तब सबको भ्रमित कर चुकी होगी।
बहुत ही सुन्दर चिन्तनपरक ...
लाजवाब सृजन।
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
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