गुरुवार, 24 जून 2021

आख़री पहर की बरसात - -

झूलती सी हैं परछाइयां अहाते में कहीं सूख
रहे हैं भीगे पल, जीने की ख़्वाहिश बढ़ा
गई है निशांत की बरसात, मझधार
का द्वीप डूब चुका है बहुत
ही पहले, अब है लहर
ही लहर, हद ए
नज़र, हम
ढूंढते
हैं अंतःनील में सुबह को एक साथ, जीने -
की ख़्वाहिश बढ़ा गई है निशांत की
बरसात। न जाने कितने ही
पागल हवाओं से निकल
कर छुआ है तुम्हें
सुख पाखी,
एक
छुअन, जो सांसों को दे जाए अनगिनत
स्पंदन, एक दीर्घ निःस्तब्धता जो
मिटा जाए व्यथित रूह की
थकन, जो दिला जाए
देह प्राण को सभी
दुःख दर्द से
निजात,  
जीने
की ख़्वाहिश बढ़ा गई है निशांत की - -
बरसात।

* *
- - शांतनु सान्याल

 

16 टिप्‍पणियां:

  1. एक दीर्घ निःस्तब्धता जो
    मिटा जाए व्यथित रूह की
    थकन, जो दिला जाए
    देह प्राण को सभी
    दुःख दर्द से
    निजात,
    जीने
    की ख़्वाहिश बढ़ा गई है निशांत की - -
    बरसात।
    दिन भर के तप्त कष्ट को झेलने की सामर्थ्य देने वाली निशांत की बरसात...।
    बहुत ही सुन्दर... लाजवाब
    वाह!!!

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  2. न जाने कितने ही
    पागल हवाओं से निकल
    कर छुआ है तुम्हें
    सुख पाखी,
    एक
    छुअन, जो सांसों को दे जाए अनगिनत
    स्पंदन, वाह बेहतरीन रचना आदरणीय।

    जवाब देंहटाएं
  3. जी नमस्ते ,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (२६-0६-२०२१) को 'आख़री पहर की बरसात'(चर्चा अंक- ४१०७) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है।
    सादर

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  4. बहुत सुंदर रचना आदरणीय ।

    सादर

    जवाब देंहटाएं

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