बुधवार, 30 सितंबर 2020

क्षितिज पार - -

कोई नहीं जानता कब और कैसे
बदल जाए हाथों की लकीर,
आज जो है मुकुट में
जड़ा क़ीमती
पत्थर
कल तक था वही अजनबी खदान
का, कोई गुमशुदा फ़क़ीर, यूँ
नज़र अंदाज़ तेरा कहीं
न बना जाए मुझे
ज़माने के
लिए
बेनज़ीर, सजे हैं कोहरे में सर्पिल  
रास्ते, जुगनुओं से आलोकित
हैं दिल की गहराइयाँ,
सिर्फ़ और सिर्फ़
तुम्हारे ही
वास्ते,
अन्तःस्थल में घनीभूत वो सभी
सुवासित मुहूर्त, उड़ना चाहे
तितलियों के झुण्ड,
तोड़ के सभी
रेशमी
धागों के ज़ंजीर, सीने में है कहीं
उष्ण कटिबंध, तेरी आँखों
से उड़ चले हैं महीन
मेघों के अनुबंध,
प्लावित मेरी
सांसों में
डूब रहे हैं कहीं शुष्क नदी के दोनों
तीर, किसे ख़बर क्या होगी
सुबह की तस्वीर।
* *
- - शांतनु सान्याल

सोने की चौखट -

कहाँ हैं पुरानी फ्रेम में नयी तस्वीर वाले,
रोज़ उभरते हैं दर्द ओ ग़म के किस्से,
कहीं चीख भी नहीं पाते टूटी फूटी
शरीर वाले, वही उज्जवल
वर्ण का अहंकार, वही
धर्म के ठेकेदार,
वही हम
और
तुम टूटी फूटी तक़दीर वाले। आज भी -
रहम की भीख मांगते हैं लोग,
आज भी सदियों की तरह
जीने का अधिकार
चाहते हैं लोग,
आज भी
वही
पुराने आईने में रामराज का बिम्ब -  -
तलाशते हैं लोग। यूँ तो घरों में
अभी तक है गहन अँधेरा,
मंदिर नदी घाटों में
है उजाला तो
रहे, मोक्ष
के लिए
शायद चाहिए वसुधैव कुटुंबकम का - -
सवेरा।

* *
- - शांतनु सान्याल  

   


मंगलवार, 29 सितंबर 2020

अनसुलझे जीवन के समीकरण - -

यद्यपि कई पहेलियाँ अनसुलझी ही
रहीं, जज़्बाती परतों के नीचे, कई
रहस्य अपने आप ही रास्ता
तलाश कर गए दूर किसी
चिंगारियों के स्वर्ग !
लेकिन तुम्हारा
निःशर्त
प्रणय
ने आख़िर बदल ही दिया मानव - -
निर्मित सभी परिभाषाएँ, और
यही वजह है कि पृथ्वी,
पहले से भी कहीं
अधिक, अब
ख़ूबसूरत
लगती है, कुछ रिश्तों का मौन सौंदर्य
होता है सहस्त्र प्रणय गीत के
बराबर, कुछ अनुराग
कभी सूखते नहीं,
मृत्यु के बाद
भी रहता
है
उनका अस्तित्व, कभी भोर की कच्ची
धूप की दस्तक लिए, कभी ओस
कणों में इंद्रधनुष का बिम्ब
समेटे हुए, और कभी
अशरीर हो कर
भी रहता
है वो
हमारे अनुभूतियों के बहुत अंदर, किसी
अरण्य पुष्प की महक लिए, वो
उतरता है निःशब्द दिल की
असीम गहराइयों में,
अपने आप में
व्यतिक्रम
लिए
हुए वो रहता हमारे साथ हमेशा के लिए,
अनसुलझे, किसी समीकरण की
तरह - - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 



आगामी दिन - -

कुछ दर्द रहते हैं उम्र भर, रेशमी कोषों
में बंद, ईशान कोणीय मेघों में
कहीं दफ़न बूंदों के ख़्वाब,
कुछ रिश्ते रहते हैं
गुम, गोधूलि
आकाश
में
तैरते हुए वर्णिल नक़ाब, खोजते हैं उन
विलीन चेहरे को, पंख विहीन भीगे
मेरे ख़्वाब, कभी कभी चुभने
वाला आलपिन, बना
जाता है शेष पथ
रंगीन, टूटी
चप्पल
सीखा जाती है बहुत कुछ ज़िन्दगी का
हिसाब, उतरती धूप दीवारों में
लिख जाती है कहीं रात
का पता, टिटहरी
की आवाज़
ले
जाती है मेघरंग, बंद लिफ़ाफ़ा, शायद
आख़री पहर से पहले, बारिश के
हमराह आ जाए कोई जवाब,
आगामी दिन तक
ख़्वाबों का ज़िंदा
रहना है
ज़रूरी,
हम रहें, या न रहें, हमें यक़ीं है ज़रूर
इक दिन आएगा दुआओं
वाला इन्क़लाब,
हर शख़्स
को
मिलेगी अपने हिस्से की रोशनी, हर -
चेहरे में होगा रंगत ए गुलाब।  
* *
- - शांतनु सान्याल

 
 

 


बारम्बार वापसी - -

जीवन की परिभाषा, उलझा हुआ ऊन
का गोला है, इस सिरे को लपेटो
तो खुल खुल जाए दूसरा
किनारा, चंद शब्दों
के गांठ से उसे
बांधना है
कठिन,
अंतहीन चाहतों का अध्याय, समझने
में जिसे पुनर्जन्म का है सहारा।  
वो ख़्वाब जिसमें हर एक
चेहरा लगे खिलता
हुआ गुलाब,
और
रिश्तों में हो पारदर्शिता अगाध।  उस -
दिव्य स्तर पर काश पहुँच पाए
कभी, अंतरतम का कुहासा
इतना घना कि अपना
बिम्ब भी न देख
पाए कभी।
उस
अदृश्य परिधि में जिस बिंदू से निकले
उसी बिंदू पर पुनः हम लौट आए,
और अधिक, और ज़्यादा
पाने की ख़्वाहिश,
अंदर गढ़ता
रहा
तृषित बियाबान, क्रमशः हम भूलते गए
दूसरों के निःश्वास, मुस्कुराहटों के
नेपथ्य का दर्द, बचाते रहे ख़ुद
को अंधकार गुफाओं से,
पाँव पसारता रहा
लेकिन हमारे
बहुत अंदर
तक
अनिःशेष रेगिस्तान। तुम्हारे चुम्बन - -
आलिंगन, सुखद नज़दीकियां सभी
थे अर्थहीन, रूह को किसी तरह
भी न बाँध पाए, वो घुटता
रहा पिंजर में किसी
अर्ध पंखी शुक
की तरह,
और
कभी किसी तरह उड़े भी तो सुदूर नील -
समुद्र हंसता रहा लवणीय व्यंग्य
की तरह - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

सोमवार, 28 सितंबर 2020

जिओ और जीने दो - -

सब संतुलन का खेल है, दो छोरों के
मध्य खींची हुई है नियति की
रस्सी, जीवन को गुज़रना
है एहतियात से दोनों
हाथ लिए सपनों
के पतवार,
मौसम
गा रहा है रहस्यमयी सुर में सरगम,
संतुलन के खेल में अपने पराए
सभी हैं बराबर, सभी हैं
एक समान दर्शक,
कभी शाबासी  
और कभी
बद दुआ
बेशुमार, लड़खड़ाते कभी संभलते उस
पार पहुँचने की कहानी कुछ भी
नहीं, रस्सी के नीचे थी फूलों
की वीथिका या अशेष
मरुधरा, ज़रा भी
सोचने का
वक़्त
ही न मिला, मेरी आँखों में था उस पार
का बिल्लौरी किनारा, मेरी भूमिका
ही थी सब से अहम, मैंने
निभाया उसे सारा,
न कोई मुझ
से जीता
न मैं
ही किसी से हारा, इसलिए मुझे किसी  
बात का तनिक भी पछतावा न
रहा, "जिओ और जीने दो"
ही रहा ज़िन्दगी का
एकमेव अदृश्य
नारा।
* *
- - शांतनु सान्याल  



निरुत्तर पलों का इतिहास - -


अचानक एक दिन, उसने पूछा - दिल
की गहराइयों का पता, प्रेम की
परिसीमा, न जाने क्या था
उसके अनुभूति का
मापदंड, मैं
निर्वाक
उसे देखता ही रहा, शायद तब सूर्य -
डूबने को था, निःशब्द छपाक
की तरह, उसके आँखों में
तैरते आए नज़र
प्रश्नचिन्हों
के भंवर,
जवाब की तलाश में चुराती रही मेरी
निगाह उसकी नज़र, और उसी
कश्मकश में कब शाम ढली
और कब घिर आया
सुरमयी अँधेरा
पता ही
न चला, कुछ प्रश्न, आजन्म रहते हैं
निरुत्तर, नीरवता के सीने में
उस दिन टूटे थे स्वप्निल
गुलदान, सठिक
विकल्प
खोजना था उन पलों में बहुत कठिन
देह और प्राण के दरमियान,
नज़रअंदाज़ करना भी
न था आसान,
उसके
संक्षिप्त निगूढ़ प्रश्न का उत्तर मैंने
चाहा था गढ़ना अपने इच्छाओं
के अनुरूप, जहाँ प्राण का
मूल्य था नगण्य
और दैहिक
सत्ता
थी अमूल्य, केवल बाह्य आवरण - -
और छद्म रंगरूप, गंध विहीन
पुष्प की नियति, रंगीन
कागज़ों से उभरी
चमकदार
कृति,
शायद यही वजह थी कि कुछ ही पलों
में जल के राख हुए अगर - चन्दन
के धूप, सिर्फ़ उठा गंधविहीन
उर्ध्वमुखी धुआं, और
पृथ्वी पर पड़ा
रहा शापित
निर्जल
देह का कुआं।
 * *
- - शांतनु सान्याल
    
 

 



सर्वदा संभव नहीं - -

पाप पुण्य के चक्रांत में फेंक देह प्राण,
वो अब अर्ध नग्न शरीर लिए चढ़
रहा है मंदिर सोपान, नदी
यथारीति, देखती है
विस्मय से
उसका
ये आडम्बर युक्त आरोहण, उत्तरीय -
विहीन काँधे से छलकना चाहता
पवित्र जल कुम्भ, वो अभी
है महा ऋत्विक, पार
कर आया हो जैसे
क्षीरसागर !
शायद
वो अब पोंछेगा, देवालय का उपास्यमंच,
गूंथेगा कुसुम माला, पत्थर में घिसेगा
चन्दन काठ, जगाएगा पञ्च
प्रदीप, किन्तु ह्रदय शंख
यथावत है निःशब्द,
ध्वनि विहीन
चाहे
जितना फूंको, प्रतिध्वनि लौट कर नहीं
आएगी, तुलसी माला छू कर वो
करना चाहता है प्रायश्चित,
लेकिन उसके देह कोष
में हैं सहस्त्र माया
आबद्ध ! वही
आदिम
युगीन आग्नेय खेल, बलात प्रस्फुटन
का है वही नेपथ्य दलपति, विश्व
में सिर्फ वही नहीं नक़ाबपोश,
समस्त तथाकथित
दिव्यलोक के
ठिकाने
है उन्हीं छद्म पुरुषों के पास, उन्हें ज्ञात
है कैसा रखा जाए समाज को अपनी
मुट्ठी में, वही धीमे ज़हर का
दीर्घकालीन असर,
अपने वजूद
के लिए
जादू का खेल और अंत में अपने माथे
पर रंगीन पंखों का गुच्छ ! जो
कहना चाहता है, वही एक
है श्रेष्ठ पुरुष, धर्म
का एकमात्र
पुरोधा,
समाज केवल है उसका अनुचर, शोषण
का चाबुक है उसके हाथ वो जहाँ
चाहे वहां ले जाएगा हाँक
कर, लेकिन उसी
बिंदू पर है
ठहरा
हुआ आगामी काल का महाभारत किसी
अदृश्य शंख के उद्घोष पर - -
* *
- - शांतनु सान्याल


रविवार, 27 सितंबर 2020

निजस्व वानप्रस्थ - -

वैराग्य के मुखौटे को रख आया है जीवन
उसी दिवार के मायावी कील पर, यहीं
पर सत्य का है बहु प्रतिबिम्ब,
अंदर के कलंकित नायक
का आर्विभाव ! ख़ुद
के अंदर ख़ुद
को खो
के
पाना, चक्रव्यूह तोड़ के अभिमन्यु का - -
पुनर्जन्म, अनावृत्त शरीर का
अदृश्य अंगार शयन, चेहरे
पर जमे परतों का
क्रमशः पतन,
उज्जवल
रात में
हिमनद का अदृश्य गहराई में विगलन, -
आँखों के सामने चरमरा के टूटता
अंतर्मन का दर्पण ! इन्हीं
टूट - फूट के मध्य
छुपा होता है
उद्भासित
रहस्य
का जगत, पाप पुण्य का लेखाचित्र - - -
पुनः प्रवर्तन, उष्ण आंच से
निस्तार, परिपूर्ण
जीवन की
मन्त्र
प्राप्ति, स्वमूल्यांकन की पुनरावृत्ति, - -
चार दीवारों में रह कर भी छू न
पाए जिसे दुनिया की कोई
रंगीन आसक्ति, ख़ुद
के भीतर निजस्व
वानप्रस्थ।
 * *
- - शांतनु सान्याल
 
     


  

उत्तरायण का इंतज़ार - -

धुंधभरे जिल्द की किताब को रख दो
कहीं कांच की अलमारी में बंद,
जीवन की वास्तविकता
ग़र जानना हो
तो मिलो
उस
अंधकार गली के किसी मोड़ पर जहाँ
शैशव एक ही रात में पहुँच जाता
है पूर्ण वयस्कता की ओर,
सूर्य की प्रथम किरण
में खिलने की
चाह
असमय ही मर जाती है सीने के - -
बहुत अंदर, श्वासरुद्ध  और
धुंएँ के मध्य कहीं
जीवन करता
है मौन
संधि,
परस्पर जहाँ शिकायत की कोई भी
जगह नहीं, सिर्फ़ वर्तमान के
साथ समझौता, जहाँ
अतीत और
भविष्य
की बातें जीवाश्म से अधिक कुछ -
भी नहीं, उन धुंधभरे गुमशुदा
पृष्ठों में हांफ उठते हैं कुछ
निःशब्द चेहरे, कुछ
कुछ फेर लेते
हैं नज़र
अजनबी की तरह, जहाँ खुल जाती
हैं अपने आप आत्मीयता की
गिरह, उन्हें मालूम है
उन्हें उठाने के
लिए कोई
अर्जुन,
कोई मसीहा न आएगा, उम्र भर वो
सिर्फ करते हैं प्रतीक्षा किसी
उत्तरायण का - -
* *
- - शांतनु सान्याल    





शनिवार, 26 सितंबर 2020

यात्री विहीन सफ़र - -

उस रेशमी अंधकार में जान पाना
नहीं था आसान, कहाँ हैं
अंतिम घाट की
सीढ़ियां और  
कहाँ
है नदी गह्वर, सिर्फ़ अंदाज़ से -
जीवन बढ़ता गया, उसकी
प्रणय गभीरता की
ओर, अदृश्य
भावनाओं
की
उन जलज लतिकाओं में, खोजता
रहा उसके सीने का मर्मस्थल,
सिर्फ अनुमान से अधिक
कुछ भी न था, कभी
किनारे से सुना
उसका
अट्टहास, और कभी मृत सीप के -
खोल में देखा चाँदनी का
उच्छ्वास, वो कोई
सुदूरगामी ट्रेन
थी मध्य -
रात
की, यात्री विहीन, देवदार अरण्य
के स्टेशन में रुकी कुछ पल,
अंतिम प्रहर के स्वप्नों
को बिठाया और
सुदूर कोहरे
के देश
की ओर गई निकल, निष्पलक -
मैं देखता रहा उन्हें दूर तक,
शायद उनका गंतव्य
हो क्षितिज के
उसपार,
किसी शिशु की निश्छल मुस्कान
में हों कदाचित उनका घर,
किसी मरुभूमि के टीले
पर वो मेघ कण की
तरह जाएं
बिखर,
किसी बंजारे प्राण को मिल जाए -
गुमशुदा अपना घर।
* *
 - - शांतनु सान्याल


 
 
 



सुबह का विष पान - -

क्या तुम अब तक बैठे हो घुटने में
सर को छुपाए, अलिंद से उतर
कर बहुत पहले दोपहर की
धूप जा चुकी है सुदूर,
पोखर किनारे
खड़ा
एकाकी खजूर पेड़ पर लौट आई है
मायावी अंधकार, थम चला
है पक्षियों का कलरव,
क्या तुम अभी
भी खोज
रहे
हो बासी फूल के नीरस गंध, अतीत
के पृष्ठों में लिखी कोई अबूझ
कविता, जीवन तो है चिर
उद्दाम, खेलता है लुक -
छुप नियति के
साथ, अब
भी
रात है बहुत बाक़ी, आलोक - छाया -
का खेल, अभी तो सिर्फ आरम्भ
की है बेला, कौन है मृग और
कौन मृगया, सब कुछ
है अनागत के
गर्भ में
समाहित, खोने और पाने के मध्य
ही छुपा है जीवन का सारांश,
ब्रह्मशिरा हर युग में
उभरती है दिगंत
पार, हर युग
में जन्म
लेता
है कोई न कोई तारणहार, हर एक - 
सुबह निगलती है विषाक्त
अंधकार - -
* *
- - शांतनु सान्याल





 


शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

ख़्वाब का ठिकाना - -

अपने आप खुल चले हैं लम्हों की
सिटकनी, सिर्फ़ कुछ स्तम्भ
हैं बाक़ी, उन्मुक्त हैं सभी
प्राण द्वार, रिक्त है
पिंजर, कोहरे
में है
प्रवाहित अनबूझ ख़्वाहिशों की -  
बालकनी। अकस्मात मौन
है छद्मवेशों का शहर,
अचानक तुम
और मैं
फिर
हैं अंतर्लीन, कदाचित बहुत पास
है आख़री पहर। तुम्हारे सीने
में है कहीं आबाद, सुख
का देश, ख़ाना -
बदोश -
दर्द
मेरे चाहें वहां अदृश्य प्रवेश। कोई
मेघ संग उड़ता ख़त, छूना चाहे
मेरी पलकों को, शायद
उसे मालूम है रत -
जगे ख़्वाब का
ठिकाना,
कुछ
कविताएं शीर्षकविहीन,परिचित
गंध लिए, दुआओं के मौन
शीत स्पर्श रख जाती हैं
चुपचाप उष्ण माथे
पर, फिर कोई
विवर्ण
पलों को चाहता है निशिपुष्प से
सजाना, उसे मालूम है रत -
जगे ख़्वाब का ठिकाना।
* *
- - शांतनु सान्याल  
 

   

 
 
 
 


विप्लवी बिहान - -

एक अनिःशेष तृषा लिए सीने में,
जब टूट जाए मध्यरात की
गहरी नींद, तब खुले
खिड़की के पार
मैं खोजता हूँ
टुकड़े -
टुकड़े उल्का आलोक, रात्रि तब
लगती है बहुत असहाय,
लंगड़ाते हुए चली
जा रही हो
सुदूर
ओढ़े हुए सदियों पुरानी गहरी -
काली शाल, न जाने कौन
है खड़ा दिगंत पार
हाथों में लिए
उजालों
का
हार, या वो भी मेरी तरह है मृग
तृषा की शिकार, मैं अपलक
उसे देखता हूँ कौतुहल
से, वो चली जा
रही अकेली,
पत्तों
की तरह झर रहे हैं आकाश से -
तारक वृन्द, और छंट रहे
हैं अभिशापित घने
अंधकार, धीरे -
धीरे
क्षितिज में उभर चले हैं, रंगीन
विप्लवी वर्णमाला, फिर
कोई बढ़ाएगा हाथ,
व्यथित
अहल्या को है युग - युगांतर से
प्रतीक्षा, कोई सुबह तो
ले, पुनः कालजयी
अवतार।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 24 सितंबर 2020

एकाकी यात्रा - -

 कुछ लोग अंदर से होते हैं सघन
आभासी, बाहर से धुले हुए,
उजले उजले से, कोरे
कपड़े की तरह,  
करते हैं
इकट्ठे सिर्फ शाबासी। कुछ लोग -
बाहर से होते हैं धूसर, किंतु
अंतर में छुपाए रखते
हैं मरूद्वीप, जैसे
मुक्ता छुपा -
रखे कोई
सीप।
किताबों में जो ढूंढते हैं रूपकथा,
वो क्या जाने ज़िन्दगी की
वास्तविकता, अग्नि -
पथ में चले बग़ैर
मुश्किल है
जलने
की
अभिज्ञता। तुम क्यूँ न जीत लो  
सारी दुनिया, दर्पण उतार
ही देगा तुम्हारे छद्म -
आवरण, अंतर्मन
के आगे तुम
निर्वस्त्र
खड़े
हो, बिखरे पड़े हैं चारों तरफ बस
चमकीले मिथ्याचरण। अपने
ही यक्ष प्रश्नों का उत्तर
देना यहाँ आसान
नहीं, सभी
अपने
पराए लौट गए, उठता रहा धूम्र
वलय उर्ध्वमुखी, तुम्हारे
हाथों में अब कोई भी
आसमान नहीं,
आकाश
पथ
में तुम्हारी है एकाकी यात्रा, यहाँ
किसी से कोई जान पहचान
नहीं, न सराय, न कोई
रहनुमा, तुम हो और
महाशून्य, यहाँ
कोई वास
स्थान
नहीं।
* *
- - शांतनु सान्याल  
 

हथेलियों में बंद धूप का वृत्त - -

सारा शहर भीगा, रस्ते घाट भीगे,
कपोत काग भीगे, झरोखों
से लिपटे उजालों के
याद भीगे, बहुत
अंदर है कोई
गंधक का
खदान,
न बुझे न ही परिपूर्ण सुलगे बस
दूर तक धुंआ सा उठे, सभी
सीमाबद्ध हैं अपने ही
दायरों में, कैसा
लेना देना,
कोई
सोए इस तरह की उम्र भर न -
जगे, कभी सजल लम्हों
में उतरती रही रोशनी
तेरी निगाह से,
कभी तेरी
आंखों
में बहुत धुंधला सा आसमां लगे,
मैंने पूछा है तेरा पता डूबते
तारों से, उभरते सुबह
के उजालों से,
कभी तू
है मेरे
मुट्ठी में तितली की मख़मली - -
एहसास लिए कभी
गुमशुदा मशालों
का कारवां
लगे,
छप्पर के किसी छेद से उतरती
है वो ख़ुशी, कुछ पलों के लिए
ही सही तू मेरी हथेलियों
में ठहरे हुए विद्रोह
का निगहेबां
लगे ।
* *
- - शांतनु सान्याल

बुधवार, 23 सितंबर 2020

क्षणिक सुख - -

कभी स्थिर पलों में, बहुत कुछ कहने
की चाह में, कांपते हैं होंठ, कभी
बहुत कुछ कहने के बाद भी
रह जाती है, दिल की
बात दिल में,
कभी
निगाहों में उभरते हैं महीन बादलों के
कण, कभी डूब जाती हैं पलकें
अपने ही साहिल में। कोई
नहीं रुकता किसी के
लिए, ज़िन्दगी
का सफ़र
किसी
ख़्वाब ए दरख़्त से कम नहीं, दूर से
देखो तो वादी ए नील नज़र आए,
क़रीब पहुंचो तो उष्ण बालू
का है टीला, माया मृग
की तरह दौड़ता
रहता है
ख़्वाहिशों का ये बेलगाम सिलसिला।
चाहते हो मुझे छूना, नज़दीक
से अनुभव करना, अपनी
हथेलियों में रखना,
कुछ पलों का
सुख, ये
जान के भी, मामूली सा बुलबुला हूँ -
पानी का, रख लो मुझे जहाँ
चाहे, तुम्हारी हो मर्ज़ी,
न हो जाए पटाक्षेप
पलक झपकते,
मेरी रंगीन
कहानी
का।
मामूली सा बुलबुला हूँ पानी का - - -
* *
- - शांतनु सान्याल

 




पुनः देह प्रवेश - -

 

बरामदे की आयु समाप्ति की ओर है
या धूप की है अपनी निर्वाचन
विधा, कहना कठिन है,
लेकिन यही तो है
जीवन की
वास्तविकता, समय का स्रोत कभी
नहीं रुकता बहा ले जाता इस
पार उस पार सब कुछ,
दोनों किनारे में
पड़े रहते
है कुछ
स्मृति के धूसर खोल, और विस्मृत
गीतों के स्वरलिपि, जीवन नैया
अपने लय में बहती जाती
है सुदूर अज्ञात द्वीपों
की ओर, फिर
भी मन
लौट के देखना चाहता है पीछे छूटे
हुए घाट, मंदिर की सीढ़ियां,
और सुदूर टिमटिमाते
हुए साँझ बाती,
और मद्धम
सुरों
में सांध्य आरती, कहीं बहुत दूर तुम
अभी भी खड़ी हो, धुंधलके में
लेकर आँखों में स्वप्न
अंजलि, इतना
सहज नहीं
मायावी
दीपों को नदी के तट पर यूँ ही बहा
देना, अचानक सब कुछ जैसे
सहस्त्रमुखी आरसी -
नगर, चारों तरफ
प्रतिध्वनित
ख़ुद का
प्रतिफलन, शेष प्रहर में नदी का - -
सहसा सूख जाना, पलातक
भावनाओं का पुनश्च
देह के टूटे पिंजर
में लौट आना,
बरामदे
की
एक मुट्ठी धूप की चाहत आसानी से
ख़त्म कभी होती नहीं - -  
* *
- - शांतनु सान्याल





अंतहीन नीरवता - -

तुम्हीं गढ़ने वाले, तुम्हीं हो उपासक
और तुम ही हो डूबाने वाले,
समझ के परे है ये
विनिमय का
खेल।
फिर भी मैं हमेशा की तरह दौड़ आती
हूँ, वही शिउली गंध भरे पथ से
तुम्हारे द्वार, तुम्हारे हाथों
ही होता है मेरा समर
श्रृंगार, और हो
उठती हूँ
रण -
वीरांगना, करती हूँ रिपु दल का संहार,  
मुझे ज्ञात है, बहुत कठिन है उस
हाड़ मांस के असुर का दमन,
दिग दिगान्तर में बिखरे
हुए हैं सहस्त्र बीज
के अंकुरण,
तुमने
केवल खेला है गुड़ियों का खेल, शायद
इसी कारण मैं रह गई मात्र माटी
की प्रतिमा, और खेल के अंत
में बहा दी गई मलिन
स्रोत में, चिर
उपेक्षित
अबला के रूप में, तुमने गढ़ा अवश्य
लेकिन प्राण प्रतिष्ठा रही अधूरी,
इसलिए मेरी नियति रही
केवल मृण्मयी,
अंतहीन  
नीरवता की प्रतीक, सिर्फ़ एक मौन - -
प्रतिमा।
* *
- - शांतनु सान्याल


मंगलवार, 22 सितंबर 2020

पुनर बलिदान - -

उस आर्द्रा नक्षत्र के, गाढ़
तमस वर्षा की रात में,
तुमने दिया था मुझे
अभयदान, मैंने
चाहा था
सिर्फ
कुछ प्रहरों का आश्रय, ये
जान कर भी कि मैं हूँ
एक शत्रु देश का
पलातक
सैनिक,
रुधिर झरित बाहु पर - -
तुमने बाँधा था
विश्वास का
 छिन्न
आँचल, उस करुणाधारा
में परितृप्त हुआ  
आहत देह
प्राण,
समवेत कण्ठों से उठा - -
तुम पर देश द्रोह का
अभियोग, क्रोधित
था सम्पूर्ण
बुद्ध -
विहार, संघ प्रमुख ने - -  
दिया तुम्हें मृत्यु
का उपहार,
तुम्हारे
दो प्राञ्जल नेत्रों में था
मुक्ति द्वार, मैंने
किया मुक्ति -
स्नान,       
चैत्य
प्रांगण में थी अपार  - -
भीड़, लांछित,
अपमानित
चेहरे में
थी
लेकिन तेजस्विनी हंसी,
और हाथों में विष पात्र,
तुमने कहा ये नहीं
अवसान, हे !
तथागत
मानवता के लिए पुनः
प्रस्तुत होगा मेरा
बलिदान - -  
* *
- - शांतनु सान्याल    





काश जान पाते - -

वो आदमी जो फूटपाथ पे रात
दिन, धूप छांव, गर्मी सर्दी
अपने हर पल गुज़ार
गया, काश जान
पाते उसके
ख़्वाबों
में ज़िन्दगी का अक्स क्या था,
वो शख़्स रोज़ झुकी पीठ
लिए बड़ी मुश्किल
से रिक्शा
चलाता
हुआ
कल शाम गिर कर उठ न पाया,
काश जान पाते कभी उसके
 दिल में सुबह की
तस्वीर क्या
 थी वो
चेहरा गुमसुम रेस्तरां में आधी
रात ढले काम करता रहा,
उम्र भर गालियाँ
सुनता रहा,
काश
जान पाते उसके बचपन के हसीं
लम्हात क्या थे, वो बूढ़ा
माथे पे बोझ लादे
हुए मुख़्तलिफ़
ट्रेनों का
पता
देता रहा, मुद्दतों प्लेटफ़ॉर्म में
तनहा ही रहा, काश जान
पाते उसकी मंज़िल
का पता क्या
था, शहर
के उस बदनाम बस्ती में,पुराने
मंदिर के ज़रा पीछे, मुग़लिया
 मस्जिद के बहोत क़रीब,
शिफर उदास वो
बूढ़ी निगाहें
तकती
हैं गुज़रते राहगीरों को, काश
जान पाते उसकी नज़र
में मुहब्बत के
मानी  
क्या थे, वृद्धाश्रम में अनजान,
भूले बिसरे वो तमाम आँखें
झुर्रियों में सिमटी
जिंदगी, काश
जान
पाते, वो उम्मीद की गहराई
जब पहले पहल तुमने
चलना सिखा था,
वो मुसाफिरों
की भीड़,
कोलाहल, जो बम के फटते
ही रेत की मानिंद बिखर
गई ख़ून ओ हड्डियों
में काश जान
पाते कि  
उनके लहू का रंग हमसे कहीं
अलहदा तो न था, ख़ामोशी
की भी ज़बाँ होती है,
करवट बदलती
परछाइयाँ
और
सुर्ख़ भीगी पलकों में कहीं,
काश हम जान पाते
ख़ुद के सिवा भी
 ज़िन्दगी
जीतें हैं
और भी लोग - - - - - - -
* *
- - शांतनु सान्याल

निकटवर्ती लोग - -

निःशर्त कुछ भी नहीं है इस
जगत में, फिर भी
अच्छी लगती
है झूठी
प्रतिश्रुति, कुछ भीगा भीगा
सा मनुहार, ज़रा सा  
ही सही कुछ तो
रहे मेरे
भीतर,ग्रीष्म शेष की अनाहूत
सांध्य वृष्टि, कदाचित
सोंधी गंध बन
जाए एक
दीर्घकालीन अनुभूति, बहुत -
दिनों के पश्चात वो झांक
गए अधखुले दरवाज़े
से, कहने को यूँ
तो वो हैं
बहुत
निकटवर्ती, दरअसल हर कोई
है अपनी ही परिधि में
उलझा हुआ, किसे
कौन कहे भला
बुरा, सब
कुछ
तो है अपनी ही निर्मिति, बस
वक़्त के प्रवाह में ख़ुद को
बहाना है ज़िन्दगी,
अच्छी लगती
है झूठी ही
सही
प्रतिबिम्ब की शून्य प्रतिश्रुति।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

सोमवार, 21 सितंबर 2020

विसर्जन पथ - -

अनंत काल तक मैं लौटना चाहूंगा उसी
नदी के किनारे, जहाँ छूती हों वट -
जटाएं बृहत् नदी के धरातल,
निःसीम आकाश के
तारे जिसके
वक्ष में
लिखते हैं कृष्ण राधा की पदावली, मैं -
जन्म जन्मांतर तक रहना चाहूंगा
उसी घाट के पत्थर में, जहाँ
उजान प्रवाह के नाविक
बाँध जाते हैं अपनी
मयूरपंखी नौका,
मैं बारम्बार
आना
चाहूंगा उसी धूसर गली में,जहाँ खेलते
हैं बच्चे नदी - पहाड़, वहीँ कहीं मैं
छूना चाहूंगा बचपन की जल -
छवि, ग़लत शब्द विन्यास
का प्रथम प्रणय पत्र,
जो अप्रेषित
रहा
आज तक, मैं हज़ार बार आना चाहूंगा
उसी पगडण्डी में, जो जाती है नदी
की ओर, जहाँ से देवी लौट
जाती है कैलाश, उसी
जल गर्भ में डूब
के देखना
चाहूंगा
जीवन का  वास्तविक प्रतिबिम्ब - - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 

निहत भावनाओं की कथा - -

उथले आसमान में फिर एक धूसर दिन
की है शुरुआत, कुछ अदृश्य नंगे
पाँव करते हैं अठखेली, कोई
अदृश्य नक्षत्र फेंकता
है रंगीन पाशा,
मेरे एक
हाथ
में है निषूदक डोरी, दूसरे हाथ शून्यप्राय
शिशु औषध की शीशी, देखता हूँ
डूब रहें हैं सभी, न उभरने के
लिए, सूरजमुखी के पौधे
हैं विभ्रांत, दिशाहारा
सूर्य की भाषा,
कुछ
कुम्हलाए पत्ते, हंसने की चाह में उठाना
चाहें उतरनों की दिलासा, उंगली
की नोक में है कांच की चुभन,
चूस लेंगे हम यथापूर्व
मरती नहीं मारे
जीवन की
आशा।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
 


 


रविवार, 20 सितंबर 2020

केतकी वन के पार - -

अधूरा रहा जीवन वृत्तांत, तक़ाज़े से
कहीं छोटी थी रात, हर चीज़ को
लौटाना नहीं आसान, संग
हो के भी कुछ निःसंग
पल, निबिड़ रात्रि
विवस्त्र
एकांत। हर तरफ अंकों का बिखराव, -
गणित की किताब अंदर तक
खोखली, इस ध्रुव से उस
छोर तक कहीं नहीं
तुम्हारा सुराग़,
कुछ नमी
कुछ
कम्पन लेकिन कहीं नहीं उँगलियों के
अग्रभाग। धुंध ही धुंध, दूर तक
परिचित देह गंध, केतकी -
वन, सुदूर कहीं हो
शायद मृगतृषा
मंज़िल,
तुम और हम, भोर का निःशब्द अति -
क्रमण, कई बार लिखे, कई बार
मिटाए, असफल रहा न
जाने क्यूँ सांसों का
अन्त्यमिल।
* *
- - शांतनु सान्याल

उड़ान से पूर्व - -

छायापथ से दूर कहीं महाशून्य में
जाएं निकल, न जन्म न मृत्यु
न शोक न हर्ष, शीर्षक हीन
सभी पात्र, आलोकित
अणुओं में जाएं
मिल। कुछ
मोह -
पाश हैं बहुत ज़िद्दी रख आओ उन्हें
पहुँच के बाहर, कुछ चंद्र रश्मि
के वस्त्र, कुछ निहारिका
के रंग, अविरत बहाव
जहाँ समय भी
जाए ठहर।
सभी
कांच के थे प्रतिश्रुति, सपनों के - -
आघात से टूटे, न संदूक, न
गोपन कोई दलील, न 
दस्तावेज़, जिसे
जो लूटना
हो
ख़ुशी से लूटे। हम विनील देश के हैं
अधिवासी, हमारा कोई स्थिर
ठिकाना नहीं, शून्य से
आए, शून्य में ही
खो जाना है,
बूढ़ा
बरगद तुम्हारा, गंगा तट को छूता
छाँव तुम्हारा, मंदिर - मस्जिद,
पूरा गाँव तुम्हारा, हम
ठहरे परियायी
पाखी मुँह
अंधेरे
उड़ जाना है, शून्य से आए, शून्य में
ही खो जाना है।
* *
- - शांतनु सान्याल 
  


 

मध्यबिंदू - -

उस अदृश्य प्रवाह में हैं छुपा त्रिकाल
का अख़बार, जो पढ़ ले वही हो ले
त्रिवेणी पार, उस त्रिकोण के
मध्य बिंदू में है कहीं
गूढ़ अभिधान,
जो चुन
ले
सठिक शब्द वही बन जाए प्रकृत -
रचनाकार। अंतर्मन छुपाए
बहुआयामी दर्पण, वही
महत, जो कर पाए
आत्म मंथन,
अतल में
है
शाश्वत सत्य, और प्रचुर कालकूट
भी, सुधा पान की पंक्ति सदैव
अशेष, नीलकंठ का अभाव
चिरंतन।
* *
- - शांतनु सान्याल
   

 
 
    

शनिवार, 19 सितंबर 2020

सदियों का अवशेष - -

तोरई की बेल और ओसारे की धूप,
छूना चाहे माटी का देह, तेरी
ऊँची अटारी हे अवधूत,
हिय के बीच बसे तू
जल बिम्ब के
अनुरूप।
सभी नदियाँ आ मिले फिर भी वक्ष
स्थल रहा नोनी देश, पंछी लौटे,
नौका पहुंचे अपने घाट,
तन की झोली सदा
रिक्त, उठ गए
सभी
बाज़ार हाट, सांध्य वृष्टि, नगर - -
जनपद सब भीगे, अंतरतम
जस का तस धु धु करता
मरू प्रदेश, कुछ
शब्दों के
धुंध,
कुछ तिर्यक रेखाओं के जाल, कुछ
कोरे पासबुक, कांच विहीन
कालग्रस्त चश्में का
फ्रेम, टूटे बटन
का कुर्ता,
बस
इतना ही है मेरे सीने में रखा सदियों
का अवशेष - -
* *
- - शांतनु सान्याल

 
   

अंत बिंदू के उस पार - -

फिर किसी घुमावदार मोड़ में मिलेंगे,
अभी तक है हवाओं में जानित
गंध, ख़ुद को उजाड़ के
खड़े हैं दोनों तरफ
सालवन,
वसंत
आए या न आए ये उसकी विवशता है,
अपरिहार्य है लेकिन पुनर्मिलन।
एक मुट्ठी नील बिखेर दी
है दिगंत के उस पार,
कुछ जल छवि
मेघ, जमे
हुए
पुरातन आवेग, काश बूंद बूंद बरसे -
महावर सने पाजेब ! कुछ बाक़ी
हैं उधार, कुछ वापसी उपहार,
अशेष लेन देन, कैसे
कह दें सिर्फ़
शून्य है
अंत बिंदू के उस पार, एक मुट्ठी नील
बिखेर दी है दिगंत के उस पार।
* *
- - शांतनु सान्याल


शुक्रवार, 18 सितंबर 2020

कल का सुख - -

कुछ महीन बूंदें ढक कर रखना
चाहे आगामी सुख, कच्चे
धान के शीर्ष में है कहीं
पिछले पहर की
अगोचर
कथा,
तुम्हारे अंदर है कहीं वृष्टि प्रदेश,
ऊसर पल चाहें तुम्हें छूना,
कदाचित तुम जान
पाओ निर्जन
द्वीप की
व्यथा ।
कितना कुछ मिल जाए जीवन
में फिर भी अन्तःस्थल का
स्रोत और अधिक पाना
चाहे, कुहासे के उस
पार है भूलभुलैया
की घाटी,
मेरा
मन अविरल बह कर तुम तक
आना चाहे । आज भी है
अपनी जगह वयोवृद्ध
शुक्र तारा, मिलती
नहीं छुट्टी निवृत
क्यों न हो
जीवन
सारा,
कुछ भी कर लो मुक्ति पथ नहीं
सहज, डूब कर ही मिलता
है अंततः गहन
किनारा ।
**
- - शांतनु सान्याल







अंतविहीन तलाश -

क्या नहीं मेरे पास, कभी ख़ाली
जेब, कभी आलिंगनबद्ध
नील आकाश, दिवार
से पलस्तर का
खिसकना
है जारी,
आईने को हटा लें ज़रा कुछ चेहरे
पे रौनक आए, सिमटे हुए
हैं रिश्तों के शब्दकोष,
कोई आवर्धक
का ऐनक
लाए।
टूटी हुई आराम कुर्सी, कुछ सूखे
हुए गमलों के पौधे, पथराई
आँखों का मरुस्थल सभी
मुंतज़िर हैं कहीं से
मेघमास लौट
आएं।
मुझे कुछ भी नहीं चाहिए उन
से, कुछ मुस्कुराहटों के
झुरमुट, अहाते से
झांकते पहली
किरण के
शिशु,
जो मुझ से हैं सदियों से वाबस्ता
काश, वो फिर मेरे पास लौट
आएं।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

गुरुवार, 17 सितंबर 2020

शून्य करतल - -

यहाँ सब कुछ है हासिल, विनिमय
में चाहे ले लो ख्वाबों की ज़मीं,
हथेलियों में हिम नद का
विगलन, सीने में
सदियों का
तपन,
लेकिन कोई नहीं देखेगा तुम्हारी -  
आँख का डूबता साहिल, यहाँ
सब कुछ है हासिल, हर
एहसास पे है यहाँ
विक्रय मुहर,
बहुत
मुश्किल है यहाँ निःशर्त सफ़र - -
बस आख़िर में तुम हो, कुछ
कुम्हलाए लम्हात, और
निःशब्द, घूरता सा
आदमक़द
आईना
है
तुम्हारे मुक़ाबिल, यहाँ सब कुछ
है हासिल, कभी जो क्लिप
लगाना भूल गए, तो
देखा उम्मीद की
डोरी से सभी
ख़्वाब
उड़ गए, सुदूर आकाश पथ में, -
कटी पतंग के साथ, हम भी
हो लिए शामिल, कहने
को यहाँ सब कुछ
है हासिल।
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
 
 

मायावी बाजू बंध - -

वो कोई रतजगा पखेरू दरख़्तों
में गुमशुदा नीड़ खोजे, कभी
सूखे पत्तों की अंधगली में,
कभी सीने की कोठरी
में, उजालों की
भीड़ खोजे ।
तुम्हारा
घर
है कहीं आकाश के छुअन में, वो
बबूल के नीचे जल स्रोत खोजे,
तुम्हारे पास है गोधूलि का
रंगीन जुलूस, झिलमिल
सांध्य तारा, आलोक
विहीन पथ में
वो आज
भी
भोर की कच्ची ज्योत खोजे,
वो बबूल के नीचे जल स्रोत
खोजे । तुम्हारे जलसा -
घर में जल उठे हैं
रंगीन साँझ
बाती,
वो आज भी भीनी भीनी - -
मोगरे का गंध खोजे,
अगर, ऊद, चंदन
की चिता
जल
कर राख हुई कब से, वो - -
भूलने के लिए अब
भी तिलिस्मी
कोई बाजू -
बंध
खोजे - -
* *
- - शांतनु सान्याल







ग़लत पता - -

गुलमोहर की टहनियों में कुछ
मुलायम धूप छोड़ जाना,
अधूरी ही सही, सीने
के किसी कोने
में इत्र का,
ज़रा  
सा एहसास छोड़ जाना, फिर -
कभी अगर मिले किसी
अनचाहे मोड़ पर,
तो कम से
कम
दुआ सलाम हो जाए, ग़लत ही
सही कोई ठिकाना, मेरे
पास छोड़ जाना, यूँ
तो पतझरों से
आबाद है
मेरी
दुनिया, रेशमी यादों के, धुंधले
ही सही, कुछ मधुमास छोड़
जाना, हर तरफ हैं मृग -
तृष्णा के बादल,
शून्य में
कहीं,
हो सके तो सजल ज़िन्दगी का
आभास छोड़ जाना, मुझे
ज्ञात है रस्मे दुनिया
का फ़रेब, कुछ
मरहमी
स्पर्श
अनायास छोड़ जाना, ग़लत ही
सही कोई ठिकाना, मेरे
पास छोड़ जाना।
* *
- - शांतनु सान्याल   
 
 

बुधवार, 16 सितंबर 2020

अभी तो जी लें - -

पारदर्शी शरीर लेकर फिर चलो
निकलें प्रस्तरयुगीन नगर
में, असीम शून्य में
है कहीं नक्षत्रों
का महा -
उत्सव, विलीन हो के हम भी
देखें पत्थरों के डगर में,
खुलने को हैं अधीर
हरसिंगार गंध -
कोष, बह
कर
हम भी देखें छायामय प्रहर में,
आरोह - अवरोह से बंधी है
जीवन सेतु, पार हो
लें मिल के हम
भी इस
कुहासा से ढके अंतहीन लहर में,  
ये पल हर हाल में हैं अमर्त्य,
जी लें इसे अंतःकरण से,
फिर कभी सोचेंगे
क्या
फ़र्क़ था अमृत और ज़हर में -  !  
* *
- - शांतनु सान्याल

यूँ ही क्यों डरते हो - -

मचान पर वो हैं और हम शिकार
हेतु मवेशी, खूंटी में बंधे हुए
चारा, आखेट नहीं
थमता रात
भर, हर
एक की नज़र है चमकती आँखों
की ओर, कौन सुनेगा घुप्प
अँधेरे में छटपटाहट
हमारा। फटी हुई
चादर खींचता
हुआ
मासूम को मालूम नहीं जीवन - -
मरण का अंतर, शायद उसी
श्रमिक ट्रेन से एक दिन
वो भी लौट जाएगा,
उसी शहर के
अंदर।
यहाँ कोई भी नहीं भूखा, ये और
बात है कि लोग फ़र्ज़ी खबर
से मर जाते हैं बेवजह,
मचान के ऊपर
बैठे हैं हमारे
पुरोधा,
किसी को कुछ नहीं होगा न जाने
क्यों, लोग डर जाते हैं बेवजह।
* *
- - शांतनु सान्याल   
 
 

मंगलवार, 15 सितंबर 2020

योग वियोग बराबर शून्य - -

रुकती नहीं जीवन की गति, चाहे
रुक जाए दीवार घड़ी, रुकता
नहीं पथिक प्राण, उसे पाना
है गुमशुदा तूफ़ान, मेघ
थे बंजारे उठा ले
गए जल ख़ेमे,
फिर वही
अंतर
की
तृष्णा, वक्षस्थल में नहीं कोई - -
मरूद्यान, बिखरे हुए हैं
काल के कपाल में
अनगिनत अस्थि
पिंजर, पथ
प्रदर्शक
के
पास नहीं कोई हिसाब, कौन - -
करेगा उनका अनुसंधान,
कितने कारवां गुज़रे,
कितने तारे
टूटे और
बिखरे, नभ नहीं उदास, पृथ्वी
भी है अपनी जगह पूर्ववत
विद्यमान, कुरुसभा हो
या लोकसभा, वही
वीभत्स अट्टहास,
जीवित हो
या मृत
उनके लिए सभी एक समान ।
* *
- - शांतनु सान्याल






बिहान के गर्भ में - -


सार्वभौम सत्ता का स्वप्न रहा
अपूर्ण, शुद्धोधन का हठयोग  
न  रोक सका सिद्धार्थ
का पथ, समस्त
मायामोह के
बंधन
तोड़ वो एक दिन हुआ बुद्ध, - -
दरअसल अनागत
घटनाओं का
आँकलन
है बहुत
दुरूह, माथे की मौन लकीरों
में रहता है नियति का
गुप्त न्याय, और
वो  रहता है
अपरिवर्तनीय, अदृश्य शक्तियों
के आगे वो सदैव है मुष्टिबंद,
आज और आगामी के
मध्य की दूरी है
बहुत ही
कम,
रात गुज़रते ही सब कुछ हो जाए
 स्पष्ट, उस रहस्यमय  
बिहान के गर्भ में
है जीवन का
मर्म,सुख
दुःख
के श्रृंखल में बंधी हुई है ये सृष्टि,
आज तुम हो दिग्विजयी
राजन, संभवतः कल
तुम खड़े हो
एकाकी
मणिकर्णिका घाट तीर, हाथ में
लिए हुए भाग्य का रिक्त
कमंडल, जीवन
प्रवाह है
बहुत
अनिश्चित, विगत कल सीढ़ियों
को छूता  रहा जलधार,
आज दूर तक है
बालुओं का
एकक्षत्र
साम्राज्य, नदी निःशब्द बदल
गई बहने की दिशा
एक ही रात में,
सब कुछ
गया
बदल, नियति पर नहीं किसी का
कोई दख़ल - -
* *
- - शांतनु सान्याल  





सोमवार, 14 सितंबर 2020

विफल अंतमिल - -

तमाम रात गुज़रे लम्हों का
हिसाब मांगता रहा हृदय,
अंतमिल दे न सका
आख़री पहर,
निशिपुष्प
ने कहा
अब नहीं कुछ भी मेरे पास
गंध संचय, हिसाब
मांगता रहा
हृदय,
अलिंद छू कर लौट गए  - -
स्वप्न समीर, अब
आईना चाहे
मेरा
नग्न परिचय, हिसाब - - -
मांगता रहा हृदय,
मुखौटों में
अभी
तक है हँसी की छुअन,  - -
प्रतिबिम्ब को है
अस्तित्व का
संशय,
हिसाब मांगता रहा हृदय,  -
कभी थी उत्सुकता
सुबह की दस्तक
की, अब हर
आहट से
लगता है भय, हिसाब मांगता
रहा हृदय, कालजयी है
भोर की किरण,
अंततः फिर
खुलेंगे
निद्रित किशलय, हिसाब - -
मांगता रहा
हृदय - -
* *
- - शांतनु सान्याल






अन्तविहीन यात्रा - -

मेरी यात्रा का अंत नहीं, न ही - -
कोई अल्प विराम, कभी
अंकुरण की भूमि
कभी परित्यक्त
बंजर ज़मीं,
मेरी यात्रा
का अंत
नहीं, कभी मांग में रक्तिम पलास
और कभी मेरा पता वृन्दावन
के आसपास, कभी आँचल
में कच्चे धान की महक,
और कभी एक मूठ
चावल भी
नसीब
नहीं, मेरी यात्रा का अंत नहीं, - -
हवाओं में था शिउली
फूलों का गंध,
पितृ पक्ष
भी था
समाप्ति की ओर, मातृ वंदना थी
पुनःजागृत, लेकिन मेरी जगह
कहीं नहीं, मेरी यात्रा का
अंत नहीं, इधर
भगवती का
आगमन
उधर
गांव से मेरा निष्कासन, एक सफ़ेद
साड़ी और गले में तुलसी माला
इसके सिवाय मेरे पास
कुछ भी नहीं, मेरी
यात्रा का अंत
नहीं - -
* *
- - शांतनु सान्याल


दो गज़ ज़मीन के लिए - -

तथाकथित मानवता केवल मम त्वम्
में ही परिवृत, धर्म दर्शन, पोथी
पुराण, सब कुछ अधिनायक
के हाथ, हम आज भी
है वंचित अग्नि -
स्नान के
लिए,
युग बदले, इतिहास के पन्ने बदले, -  
लोगों ने छुआ चंद्र भूमि लेकिन
हम आज भी हैं अस्पृष्ट,
भटकते हैं लेकर
कांधे में मृत  
पार्वती,
दो गज़ ज़मीन भी नहीं श्मशान के लिए,
अपनी लकीरों में ही जीना सब कुछ
नहीं इंसान के लिए। कुबेर का
धन है तुम्हारे पास, जो
चाहे बनालो, लौह
प्रतिमा हो
या गढ़
लो काञ्चन पीठस्थान या कोई बुर्ज -
आलिशान, न निकल पाए अगर
मम त्वम् के आवृत से तो
मुश्किल है करना
मुक्ति स्नान,
अनवरत
स्व परिक्रमा, जिसका नहीं कोई भी
अवसान - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 
 
 
 

रविवार, 13 सितंबर 2020

अंतहीन परछाई - -

कुछ अनुनाद पहाड़ों से टकराए
ज़रूर, और कुछ बिखर गए  
ढलानों तक पहुँच कर,
कुछ बूंद निशीथ
में झरे ज़रूर,
कुछ
वाष्पित हो विलीन हुए कुछ सूख
गए प्राणों तक पहुँच कर।
अमूल्य बूंद की तरह
हो अन्तःस्थित,
अगोचर
किंतु
श्वासतंतु में हो अन्तर्निहित। - -
एक मौन संधि की तरह
हो कोई अनमोल
मणि, ह्रदय
शुक्ति के
अगम गहराई में, उस गहरी नींद
से कौन चाहेगा पुनर्जागरण,
ग़र मिल जाए सुख तेरी
अंतहीन परछाई
में, ह्रदय शुक्ति
के अगम
गहराई
 में।
* *
- - शांतनु सान्याल
 


   

शनिवार, 12 सितंबर 2020

गुमशुदा परिचय पत्र - -

सुबह की नाज़ुक धूप निःशब्द
पाँव, वादियों से उतर कर
शहरी कोलाहल में खो
गई, बहुत लोग
भीड़ में यूँ
ही खो
जाते हैं,कोई उनका हिसाब नहीं
रखता, कोई उन्हें तलाश भी
नहीं करता, उत्तरोत्तर
वो अपने आप ही
सभी से ख़ारिज
हो जाते हैं,
अपना
परिचय भूल जाते हैं, ग़र -  
लौटना भी चाहें तो उन्हें
कोई नहीं अपनाता,
दरअसल अब
उनका कोई
अस्तित्व
नहीं, उनके पास आत्मीयता -  
का सठिक रशीद नहीं, अब
वो विक्रित चीज़ से
अधिक कुछ
भी नहीं,
अतः
अब कोई उन्हें वापस नहीं लेगा,
वो आजन्म निर्वासित हैं,
अपने आप ही जन्म
से अभिशापित
हैं - -
* *
- - शांतनु सान्याल

   

छद्मावरण - -

टीले पर खड़े हो कर सोचता हूँ
सारी पृथ्वी का रहनुमा हूँ
मैं, और क्यों न सोचूं
मैंने ही उगाए है
नागफनी के
घने
झुरमुट, ताकि मुझ तक पहुंचना
हो मुश्किल, और अगर पहुंचे
भी किसी तरह, तो अन्न
वस्त्र तो मुझ से ही
मांगोगे, देख
लो अपनी
आँखों
से बिखरे हुए विद्रोह के अधोवस्त्र,
सोच लो मुझ से बच कर
निकलना है कितना
मुश्किल। अगर
भागे भी
किसी
तरह तो अदृश्य भुजंगों से निपट
न पाओगे, आख़िर मेरी ही
शरण में आओगे, मैं
ही हूँ ऋत्विक,
मैं ही
विषाक्त पुरुष, तुमने देखा है सिर्फ़
सतह, अभ्यंतरीण तक कभी
न पहुँच पाओगे, आख़िर
मेरी ही शरण में
आओगे।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

 

मूक दर्शक - -

राजधानी से मायानगरी तक देश है  
सिमटा हुआ, तुम किस उपांत
से आए हो किसी को कुछ
भी नहीं पता, बस
सिमटे रहो
सोलह
वर्ग
में, तुम हो वर्णमाला से बहिष्कृत,-
तुम्हें कोई नहीं जोड़ेगा उपसर्ग
में। रंगमंच में क्या चल
रहा प्रहसन या
गंभीर कोई
नाटक,
तुम
सिर्फ़ हो मूक दर्शक तुम्हें सोचने - -
समझने की कोई ज़रूरत नहीं,
रोना हो या हंसना तुम
बजाओ ताली
वरना
खुला हुआ है प्रस्थान का फाटक - ।

* *
- - शांतनु सान्याल
 


 

शुक्रवार, 11 सितंबर 2020

अविभावक की तलाश - -

कोई इस राज्य का बेटा कोई उस
प्रान्त की बेटी, नि:संतान
सा लगे है क्यों देश
मेरा, इतनी
आत्मीयता
पहले
तो देखी नहीं, मैं भिन्न भाषी हूँ -
लिहाज़ा मुझे असमय कोई
अन्न नहीं देगा, मेरे
माथे में लिखा
है प्रवासी
होने
का मुहर, इतनी भारतीयता पहले
तो देखी नहीं, इतनी आत्मीयता
पहले तो देखी नहीं। न जाने
किन क्षितिजों को छूना
चाहते हैं लोग, यहाँ
दो वक़्त की
चिंता
से आगे नज़र जाती नहीं, न जाने
किस अंधी सुई में रेशमी धागा
पिरोना चाहते हैं लोग, न
जाने किन क्षितिजों
को छूना चाहते
हैं लोग।

* *
- - शांतनु सान्याल

स्वप्न अनुधावन - -

मैं उनके पीछे नहीं दौड़ता या
यूँ कह लीजिए अब दौड़ने
की चाहत ही न रही,
जो कुछ है मेरे
पास बस
वही
सुबह तक रहे तो काफ़ी है, घर
हो या मेरा अस्तित्व, दोनों
ही महत्वहीन हैं, मेरा
शहर है आईना -
नगर, लेकिन
चेहरे बिंब -
विहीन
हैं ।
मैं नहीं देखना चाहता सपनों का
बाइस्कोप, वो बेकार ही मेरा
करते हैं अनुधावन, वो
जाएं नीलकण्ठ की
तलाश में हमें
करना है
हर
हाल में रावण दहन, सपनों से
कहें न करें हमारा बारम्बार
अनुधावन ।
* *
- - शांतनु सान्याल







रोशनदान से बाहर - -

मुझे चाहिए विस्तीर्ण रोशनदान,
जहाँ हर कोई रख सके कुछ
बूंद रौशनी के, और
खोल सके जंग
लगे संदूक
के
ताले, न जाने कितने दिनों से -
पड़े हुए हैं कोरे जज़्बात, तह
किये हुए कुछ दिल के
अरमान, मुझे
चाहिए
विस्तीर्ण रोशनदान। कौन है जो
रात ढले दस्तक दे कर छुप
जाता है, ख़ुश्बुओं का
कोई ताज़ातरीन
अख़बार
दिए
जाता है, मुझे ज्ञात है मध्यांतर
के बाद का रहस्य, फिर भी
शीर्षबिंदू मुझे चुनौती
दिए जाता है, मैं
चल पड़ता
हूँ उसी
आग्नेय पथ पर निरंतर, समय
इस दग्ध जीवन को कुछ
और निखार दिए
जाता है।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 

 
 
 

गुरुवार, 10 सितंबर 2020

जलज मरुभूमि - -

पुरातन पुस्तकीय गंध, सूखे
हुए फूल के निशान, जर्जर
पृष्ठ को पलटती हुई
मेरी कांपती
उंगलियां,
दरख्तों
पर
लिखे नाम, शायद वहीं कहीं
आज भी जुगनुओं के
घूमते हैं ज्योति -
वलय, क्या
आज
भी तुम्हें है अचानक छूने का
भय । शेष प्रहर की वृष्टि,
उपत्यका से उठता
धुंआ, भीगी -
भीगी सी
महक,
सुदूर घाटियों के नीचे दो -
अरण्य नदियों का
सम्मिलन, और
फिर अज्ञात
गुफा में
उनका
खो जाना, कितना सुख है -
उन पलों में अनायास
ही किसी का हो
जाना।
किंतु
समय का स्रोत कहाँ बहता
है समान्तराल कगार
लिए, कभी वक्ष -
स्थल में
उग
आएं मरुभूमि और कभी वो
बहे असीम जलधार लिए,
कभी तुम हो बहोत
क़रीब, दूर हो
के भी,
और कभी लगे तुम जा चुके
बहुत नज़दीक से अपने
हिस्से का उपहार
लिए।  
* *
- - शांतनु सान्याल
 
 

 











ऋणानुबंध - -

अन्धकार से उजाले की ओर
बढ़ते ही, प्रथम अनुभूति
और क्रन्दन का एक
अद्भुत सा मेल
होता
है, नाल से अलग होते ही
ऋणानुबंध का खेल
होता है ।प्रथम
आलिंगन
और
लताओं का बढ़ना, प्रथम
किरण और पंखुड़ियों
का खुलना, सब
कुछ अपनी
जगह होते
हैं पूर्व
निर्धारित, सजलता का
ढलान की ओर बहना,
तुम्हारा मुझे गहरी
निगाह से देखना,
अदृश्य संधि के
तहत ये
सभी होते हैं परिभाषित ।
तिमिर - आलोक के
मध्य कहीं छुपा
है वो स्पर्श,
जो कभी
बना दे मिट्टी को सोना
और कभी स्वर्ण हो
जाए भस्म, बन
जाए कोई  - -
अभिशप्त
मृतिका,
उस प्रणय लकीर पर है  -
लिखी हुई सृष्टि
की सजल
गीतिका ।
* *
- - शांतनु सान्याल


अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past