30 सितंबर, 2020

क्षितिज पार - -

कोई नहीं जानता कब और कैसे
बदल जाए हाथों की लकीर,
आज जो है मुकुट में
जड़ा क़ीमती
पत्थर
कल तक था वही अजनबी खदान
का, कोई गुमशुदा फ़क़ीर, यूँ
नज़र अंदाज़ तेरा कहीं
न बना जाए मुझे
ज़माने के
लिए
बेनज़ीर, सजे हैं कोहरे में सर्पिल  
रास्ते, जुगनुओं से आलोकित
हैं दिल की गहराइयाँ,
सिर्फ़ और सिर्फ़
तुम्हारे ही
वास्ते,
अन्तःस्थल में घनीभूत वो सभी
सुवासित मुहूर्त, उड़ना चाहे
तितलियों के झुण्ड,
तोड़ के सभी
रेशमी
धागों के ज़ंजीर, सीने में है कहीं
उष्ण कटिबंध, तेरी आँखों
से उड़ चले हैं महीन
मेघों के अनुबंध,
प्लावित मेरी
सांसों में
डूब रहे हैं कहीं शुष्क नदी के दोनों
तीर, किसे ख़बर क्या होगी
सुबह की तस्वीर।
* *
- - शांतनु सान्याल

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