13 सितंबर, 2020

अंतहीन परछाई - -

कुछ अनुनाद पहाड़ों से टकराए
ज़रूर, और कुछ बिखर गए  
ढलानों तक पहुँच कर,
कुछ बूंद निशीथ
में झरे ज़रूर,
कुछ
वाष्पित हो विलीन हुए कुछ सूख
गए प्राणों तक पहुँच कर।
अमूल्य बूंद की तरह
हो अन्तःस्थित,
अगोचर
किंतु
श्वासतंतु में हो अन्तर्निहित। - -
एक मौन संधि की तरह
हो कोई अनमोल
मणि, ह्रदय
शुक्ति के
अगम गहराई में, उस गहरी नींद
से कौन चाहेगा पुनर्जागरण,
ग़र मिल जाए सुख तेरी
अंतहीन परछाई
में, ह्रदय शुक्ति
के अगम
गहराई
 में।
* *
- - शांतनु सान्याल
 


   

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