03 सितंबर, 2020

दूरबीन वाले - -

जो प्रतिबिम्बों को दिखाए नग्न आँखों -
के पार ऐसा कोई अख़बार नहीं,
हर कोई अपने वजूद को
भुनाना चाहे, मोहक
जिल्द को दिखा
कर स्वार्थ
की
किताब बिकवाना चाहे, मैं वाक़िफ़ हूँ - -
तेरी नेकनीयती से ऐ दोस्त, बज़्म
में यूँ तो दिखाने के लिए बुलाता
है मुझ को, दिल ही दिल
में, शमा जलने से
पहले, तौहीन
कर के
निकलवाना चाहे, हर कोई अपने वजूद
को भुनाना चाहे। राहत कोष वाले
आए, सादे काग़ज़ पे अंगूठे का
निशान ले गए, मुद्दत हुए
सैलाब को उतरे, हम
आज भी बैठे हैं
अपने छत -
विहीन
घर के नीचे, कभी देखते हैं टूटे छत
की ओर और कभी अंगूठे को,
शायद जाते जाते वो
हमारे हिस्से का
एक मुट्ठी
आसमान ले गए, सादे काग़ज़ पे - -
अंगूठे का निशान ले गए।
 
* *
- - शांतनु सान्याल  
 
 
 

 

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