16 नवंबर, 2021

विकल्प की तलाश - -

 

न जाने कितने चेहरे, अपनी ही जगह रह
जाते हैं लौह स्तंभित, और वक़्त की
भीड़ भरी बस, गुज़र जाती है
पलक झपकते ही, हमारे
पास प्रतीक्षा के
अतिरिक्त
कोई
विकल्प नहीं होता, परछाइयां बढ़ कर हो
जाते हैं जब ऊँचे दरख़्त, तब जीवन
खोजता है तंग गलियों में अपने
होने का कोई ठोस सबूत,
उस अनुसंधान में
ज़रूरी नहीं
कि हम
हों
कामयाब, फिर भी खिल उठता है नाज़ुक
ह्रदय बच्चों की तरह, किसी कोने
में खोया हुआ ख़्वाब मिलते
ही, और वक़्त की भीड़
भरी बस, गुज़र
जाती है
पलक
झपकते ही। खोने और पाने का ग्राफ़ - -
अपनी जगह, चढ़ता उतरता रहता
है अनवरत, ज़िन्दगी कभी
थकती नहीं है, कभी
उच्च अक्षांश
पर रहते
हैं हम,
और कभी शून्य रेखा के किनारे रचते हैं
एक महादेश ! कहने को दूर दूर तक
है पसरा हुआ एक अशेष धूसर
मरुभूमि, जब तक सांस
है बाक़ी, वक्षस्थल
की गहराइयों
में ख़त्म
कहां
होती है उम्मीद की नमी, कुछ देर ही
रहता है कुहासे का साम्राज्य,
उजली धूप, हर हाल में
निकल आती है
धुंध के मेघ
छंटते ही,
और
वक़्त की  भीड़ भरी बस, गुज़र जाती है
पलक झपकते ही - -
* *
- - शांतनु सान्याल



15 नवंबर, 2021

इत्मीनान - -

कुछ भी नहीं बदला हमारे दरमियां, वही
कनखियों से देखने की अदा, वही
इशारों की ज़बां, हाथ मिलाने
की गर्मियां, बस दिलों में
वो मिठास न रही,
बिछुड़ कर
दोबारा
मिलने की आस न रही, खिड़कियों के -
उस पार, बहुत दूर हैं नील पर्वतों के
कगार, वादियों में फिर एक
शाम, हमेशा की तरह
सूरज डूबा है
अभी -
अभी, ढूंढता हूँ मैं अक्सर ज़िन्दगी के
अलबम में, अपना खोया हुआ
अस्तित्व, किंतु  अफ़सोस
वो आतशी कांच अब
मेरे पास न रही,
वही इशारों
की ज़बां,
हाथ मिलाने की गर्मियां, बस दिलों में वो
मिठास न रही। इक चाहत है या कोई
तह टूटे बिना लिबास, संदूक के
सिवा कोई नहीं दूसरा
विकल्प उसके
पास, एक
गंध था
या
कोई अनोखा सा अहसास, वक़्त के सभी
नेफ्थलीन, हो चुके विलीन, वो आज
भी है, रूह से गुथा हुआ मेरी
सांसों के आसपास,
इक बूंद क्या
मिली
उस
निगाह ए करम की, ज़िन्दगी में अब कोई
भी प्यास न रही।
* *
- - शांतनु सान्याल 

13 नवंबर, 2021

अहाते का सूखा दरख़्त - -

अब लौटना नहीं आसान, चाहे कोई
कितना भी दे आवाज़, जिस
व्यासार्ध से निकलते
थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु
पर  
थम चुकी है ज़िन्दगी, अब वो दौर
भी नहीं कि बंद दरवाज़ों पर
दे कोई दस्तक, हर कोई
अपने ही दायरे में
है सिमटा
हुआ,
एक सरसरी नज़र की तरह हैं सभी
वाबस्तगी, जिस व्यासार्ध से
निकलते थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु पर थम
चुकी है
ज़िन्दगी। हर एक चेहरे में होता है
अप्रकाशित कोई न कोई एक
इश्तेहार, बेवजह कोई
नहीं मिलता है
यहां, क्या
अपने
और क्या पराए, वही लेन देन की -
प्राचीन  परम्परा, वही जोड़ -
तोड़ का आदिम बाज़ार,
चाहतों के हैं बहुत
लम्बे से फ़र्द,
कुछ देर
की
है ये दस्त ए गर्मीबाज़ी, फिर हर
एक रिश्ता है बर्फ़ की तरह
पथरीला और सर्द, तब
जलाऊ दरख़्त से
कुछ कम नहीं
होती
अपनी मौजूदगी, जिस व्यासार्ध से
निकलते थे कभी रास्ते,
उसी बिंदु पर थम
चुकी है
ज़िन्दगी।
* *
- - शांतनु सान्याल

 

12 नवंबर, 2021

हमसाया की तरह - -

ज़िन्दगी के अहाते में आज भी उभरती
हैं किसी के मौन शब्दों की छाया,
अप्रेषित पत्रों के तहों में
कहीं आज भी है
मौजूद इक
पुरातन
सी
गंध, कितने बार खिले गुलमोहर और
कितनी बार ही बिखरीं मुरझाई
हुई पंखुड़ियां,  जुगनू की
तरह आज भी हैं
बेकल कुछ
जज़्बात
मेरी
हथेलियों में बंद, जितना भी खोलूं वो
उलझी हुईं रेशमी एहसास, उतना
ही दिल ने मुझे हर पल है
भरमाया, ज़िन्दगी
के अहाते में
आज भी
उभरती
हैं
किसी के मौन शब्दों की छाया। वक़्त
के साथ टूट जाते हैं सभी बंध, एक
निःशब्द दूरत्व बढ़ा जाती  है
नदी की गहराई, तट
भी बदल जाते हैं
रुख़ अपना,  
अतीत
का
स्लेट रह जाता है अपनी जगह ले कर
सीने पर धुंधले हर्फ़, यादें भी हो
जाती हैं एक दिन ढलते
दिन की क्षणिक
पलों की दीर्घ
परछाई,  
फिर
भी
न जाने क्यों साथ कोई चलता है दूर
तक, जैसे ख़ामोश अदृश्य कोई
हमसाया, ज़िन्दगी के
अहाते में आज
भी उभरती
हैं किसी
के
मौन शब्दों की छाया - -
* *
- - शांतनु सान्याल
 

06 नवंबर, 2021

वाष्पित बिम्ब - -

ओस में धुली हुई है निगार ए सहर,
रात के सीने में हैं दफ़्न, कितने
ही अनकहे अफ़साने, कोई
याद नहीं रखता गुज़रे
हुए अंधेरे के गुम
नाम ठिकाने,
ज़रा सा
सांस
ले लूँ फिर ज़िन्दगी करे आगाज़ ए
सफ़र, ओस में धुली हुई है
निगार ए सहर। नेपथ्य
में कहीं छोड़ आया
हूँ मैं अपना
असली
चेहरा,
जो लोग देखना चाहें वो दरअसल है
मायावी बिम्ब मेरा, यूँ भी इस
चकाचौंध की दुनिया में,
झूठ और सच के
तराज़ू पर
पड़ता
नहीं
कोई असर, ओस में धुली हुई है - -
निगार ए सहर।
* *
- - शांतनु सान्याल

04 नवंबर, 2021

दीपावली मंगलमय हो - -

फिर हों बुझे चिराग़ रौशन, ज़िन्दगी
फिर बने दिवाली की रात, कुछ
खो दिया है अंधेरे में कहीं,
बहुत कुछ पा भी लिया
है उजाले के साथ,
दुआओं के लौ
जलते रहें अंतरतम की गहराइयों में अनवरत,
आँधियों का क्या है आते जाते
रहेंगे हमेशा की तरह, बस
इल्तिज़ा है इतनी कि
अपनों का कभी
न छूटे हाथ,
बहुत
कुछ पा भी लिया है उजाले के साथ।
- - शांतनु सान्याल
 

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past