शुक्रवार, 27 सितंबर 2019

सुलह कर लिया जाए - -

आसमानी मजलिस थी कोई, उठ गई अपने
आप सुबह से पहले, इक ख़ुमार सा है
बाक़ी दिलो जां में दूर तक, मानों
फिर डूबने की हो ख़्वाहिश,
किनारे के सतह से
पहले। मेरा
वजूद
जो भी हो ज़माने की नज़र में, तुम आज भी
हो पहलू में मेरे, किसी अमरबेल की
तरह, आग का कोई घेरा हो
या मौत का अंधा कुआं,
लगते हो मानों सभी 
इक अदद खेल
की तरह।
कहाँ
हासिल है मनमाफ़िक मुराद, फिर क्यूँ न - 
ज़िन्दगी से यूँ सुलह कर लिया जाए,
निगाहों के दरमियाँ रहे इश्क़ का
वसीयतनामा, फूल मिले या
काँटे, मुस्कुरा कर ख़ाली
दामन क्यों न भर
लिया जाए,
फिर
क्यूँ न ज़िन्दगी से यूँ सुलह कर लिया जाए। 

* *
- शांतनु सान्याल

गुरुवार, 19 सितंबर 2019

एक मुठ्ठी उजाला - -

अपने आप निःशब्द खुल जाता है वक़्त
का रफ़ू, अब कोई चाहे, किसी भी
छोर से खींचे, जिस्म मेरा
अब है इक अभ्र का
का ढांचा, चाहे
कोई किसी
भी ओर
से भींचे। यूँ तो सभी ज़ख़्म  के निशान
भर गए अपने आप, नाम मलहम
पे लेकिन तुम्हारा ही रहा,
कौन साथ रहा दूर
तक, और कौन
हाथ छुड़ा
गया,
डूब के जब उभरे तो देखा, सामने केवल
डूबता किनारा ही रहा। तुम क्षितिज
पे मेरा इन्तज़ार करना, मैं  इक
मुठ्ठी उजाला हूँ, रात ढलते
बिखर जाऊँगा, रख
लेना मुझे अपने
पहलू में
कहीं, नियति ने ग़र साथ दिया तो कुछ
और अधिक निखर जाऊँगा।

* *
- शांतनु सान्याल  




बुधवार, 18 सितंबर 2019

ज़रा सी कहासुनी - -

पुराने चश्मे की तरह धुंधलके में कहीं,खो
जाते हैं सभी क़रीबतरीन किनारे,
अँधेरे में सिमटे हुए नाज़ुक
मेरे अहसास खोजते हैं
तब टूटे हुए तारे।
कोहरे में
डूबी
हुई उन वादियों में है शायद कहीं जुगनुओं
की बस्ती, तुम्हारे पलकों के साए में
कहीं ढूंढ़ती है एक मुश्त पनाह,
मेरी मजरूह हस्ती। इक
रात है या मेरी रूहे -
परेशां, अँधेरे
में भी
खोजती हैं तुम्हारे निगाहों की रौशनी, जब
कभी होती है ज़िन्दगी से मुख़्तसर सी
कहासुनी।

* *
- शांतनु सान्याल

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