19 सितंबर, 2019

एक मुठ्ठी उजाला - -

अपने आप निःशब्द खुल जाता है वक़्त
का रफ़ू, अब कोई चाहे, किसी भी
छोर से खींचे, जिस्म मेरा
अब है इक अभ्र का
का ढांचा, चाहे
कोई किसी
भी ओर
से भींचे। यूँ तो सभी ज़ख़्म  के निशान
भर गए अपने आप, नाम मलहम
पे लेकिन तुम्हारा ही रहा,
कौन साथ रहा दूर
तक, और कौन
हाथ छुड़ा
गया,
डूब के जब उभरे तो देखा, सामने केवल
डूबता किनारा ही रहा। तुम क्षितिज
पे मेरा इन्तज़ार करना, मैं  इक
मुठ्ठी उजाला हूँ, रात ढलते
बिखर जाऊँगा, रख
लेना मुझे अपने
पहलू में
कहीं, नियति ने ग़र साथ दिया तो कुछ
और अधिक निखर जाऊँगा।

* *
- शांतनु सान्याल  




8 टिप्‍पणियां:

  1. दम दिया है बुद्धि के सहारे चला करोगे
    जोत के बीज खेती के सहारे चला करोगे

    मैंने बनाया एक पुरजोर पुतला इन्सा
    तो भी तुम नियति के सहारे चला करोगे?

    शानदार

    पधारें- अंदाजे-बयाँ कोई और

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  2. लाजवाब! बिल्कुल अलग अंदाज।।
    वाह्ह्ह

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (21-09-2019) को " इक मुठ्ठी उजाला "(चर्चा अंक- 3465) पर भी होगी।


    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

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  4. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

    जवाब देंहटाएं

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