ढलती दोपहरी में नीम दरख़्त की
परछाई, तपते हुए बरामदे पर,
नाज़ुक सा इक मरहमी
एहसास रख जाए,
अजीब सी है
मुंतज़िर
पलों
की अनुभूति, उड़ चुके हैं सुदूर - -
फूलों की वादियों में, वो सभी
सप्तरंगी तितलियों के
झुण्ड, बंद पलकों
की सतह पर
तैरते हैं
कुछ
स्पर्श की बूंदें, जाते जाते हलकी सी
कोई मुस्कान मेरे ओठों के पास
रख जाए, तपते हुए बरामदे
पर, नाज़ुक सा इक
मरहमी एहसास
रख जाए।
अंतहीन
होती
है
उम्मीद की गहराई, सतह को छू कर
अंदाज़ लगाना है मुश्किल, जो
दिखता है ज़रूरी नहीं वो
असली हो, इस दौर
में क्या पीतल,
क्या सोना,
देख कर
फ़र्क़
बताना है मुश्किल, मूल्यांकन का क्या
है भरोसा, बदल जाए हर एक हाट
बाज़ार के मोड़ पर, अनछुई
सी इक ख़ालिस चमक
कोई यूँ ही मेरे
पास रख
जाए,
तपते हुए बरामदे पर, नाज़ुक सा - - -
इक मरहमी एहसास
रख जाए।
* *
- - शांतनु सान्याल

जी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(०९-१०-२०२१) को
'अविरल अनुराग'(चर्चा अंक-४२१२) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
आपको पढ़ना एक सुखद अनुभव
जवाब देंहटाएंसुंदर, सार्थक रचना !........
जवाब देंहटाएंब्लॉग पर आपका स्वागत है।
गहन भाव लिए सुंदर रचना।
जवाब देंहटाएंप्रणाम
सादर।