26 अप्रैल, 2026

तिमिर स्नान - -

सारे महानगर में है एक अजीब सा रंग मशालों का उद् घाटन,

राजपथ के दोनों तरफ हैं
खड़े मंत्रमुग्ध से सहस्त्र
जनगण, गुजरेगा
कुछ ही देर
में राजन
का
स्वर्णिम रथ पुनः बिखर जाएंगे
सभी मायावी स्वप्न, निःशब्द
सीलन भरे दीवारों के
मध्य यथावत अंध
अवगाहन, सारे
महानगर में
है एक
अजीब सा रंग मशालों का उद् घाटन । रहस्यमयी निशीथ - देती है दस्तक, कदाचित
लौट आया हो बरसों
का पलातक, पुनः
यशोधरा है
श्रृंगार
रत,
सारे देह में लपेटे स्वप्न भष्म वो
चाहती है अरण्य गमन, भोर
से पहले गहन निमज्जन,
सारे महानगर में है
एक अजीब
सा रंग
मशालों का उद् घाटन ।
- - शांतनु सान्याल 

22 अप्रैल, 2026

अपनी शर्तों के तहत - -

मेरी कविताओं का शीर्षक कुछ भी हो

लेकिन वो जीती हैं अपनी ही शर्तों
के तहत, मेरे जीवन का गंतव्य
अज्ञात सही, बियाबान से
लेकर समंदर तक मुझे
तलाश है एक अदद
सुकून की अपने
अंदर तक,
अपनी
ही शर्तों के तहत । मेरे शब्दों का विस्तार
हो अनंत आकाश से गहन सागर
के हृदय तक, ख़ानाबदोशों
की तरह उन्मुक्त हों
तोड़ के सभी
स्वर व्यंजन
की जटिलताएं, मेरी भावनाओं को मिलें
अशेष उड़ान, अंतर्तम में समा जाएं
प्रलयंकारी बवंडर तक, हों सब
कुछ उद्भासित, आडम्बर से
नग्न सत्य के खंडहर
तक, अपनी ही
शर्तों के
तहत ।
- - शांतनु सान्याल

08 अप्रैल, 2026

छायानृत्य - -

अलौकिक रंगमंच पर है मंचित छायानृत्य,

उल्लसित दर्शकों के मध्य है प्रसारित
मायावी अंधकार, हर एक हाथ
छूना चाहे देह का बालूमय
टापू, सिमटता जाए
उम्र का ढलता
किनार, इस
रात के
सीने पर है पुनः लज्जित अंतरतम का
सत्य, अलौकिक रंगमंच पर है
मंचित छायानृत्य । युगों
का थमा हुआ
अट्टहास,
पुनः
हो चला है जागृत, पुनर्जन्म के संधान में
चल पड़े हैं अभिशापित सभी जीवित
या मृत, अनंत पथ के वो यात्री
पाना चाहे इसी धरा पर
सूत्र अमर्त्य, अलौकिक
रंगमंच पर है मंचित
छायानृत्य ।
- - शांतनु सान्याल

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