कहीं भी रहो शीशमहल हो या कोई अज्ञातवास, समय हर हाल में ले के रहेगा स्व
कर्मों का पाई पाई
हिसाब, मिलता
नहीं किसी
को
जतु गृह से निकास, यूँ तो कहने
को वो शख़्स था सारी दुनिया
का पुरोधा, जिस ने अपने
स्वार्थ के लिए आम
जनता को उल्टा
पुल्टा जैसा
चाहा
वैसा साधा, वक़्त का फेर देखो वही महाबलि आज अपने
कांधे पर लिए फिर
रहा है अपनों
की लाश,
मिलता
नहीं
किसी को जतु गृह से निकास ।
जिस की तस्वीर लगी रहती
थी शहर के हर एक गलि
कूचों में, वही आज
चेहरा छुपाए
बैठा है
गुमनाम दरीचों में, शून्य बटा सन्नाटा है सिर्फ उसके
आसपास, मिलता
नहीं किसी
को
जतु गृह से निकास ।
- - शांतनु सान्याल
