तुम्हें संवारने की चाह में हज़ार बार
उजड़ा है मेरे अंदर का उपवन,
न जाने किन रास्तों से
हो कर गुज़री है
ज़िन्दगी,
कभी
वक़्त मिले तो देख लेना प्रणय कुंड
का चिर दहन, तुम्हारी चाहत
में हज़ार बार मैंने छोड़ी
है अपनी मधुरिम
काया, और
धारण
की,
अपने अन्तःस्थल में केवल तुम्हारी
ही छाया, फिर भी एकाकी ही
रहा मेरा जीवन, तुम्हें
संवारने की चाह
में हज़ार बार
उजड़ा है
मेरे
अंदर का उपवन। तुमने चाहा कि -
सभी संग्रहित सुखों का हो
परित्याग, सुतराम्
अपरिग्रह के
पथ पर
हो
अग्रसर, मैंने गहन अरण्य को बोया
अपने अंदर, फिर भी मैं अकेला ही
रहा, कहने को हम सभी के
भीतर बहती हैं असंख्य
स्रोतस्विनी, जो
एक दूजे से
मिल कर
भी
कभी नहीं मिलती, मृगजल के सिवा
कुछ भी नहीं होता उस अंत्यमिल
बिंदु पर, फिर भी देता है ये
निःसीम सुख, अंतर का
कालजयी समर्पण,
तुम्हें संवारने
की चाह
में हज़ार बार उजड़ा है मेरे अंदर का -
उपवन - - -
* *
- - शांतनु सान्याल
09 अगस्त, 2021
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past
-
नेपथ्य में कहीं खो गए सभी उन्मुक्त कंठ, अब तो क़दमबोसी का ज़माना है, कौन सुनेगा तेरी मेरी फ़रियाद - - मंचस्थ है द्रौपदी, हाथ जोड़े हुए, कौन उठेग...
-
मृत नदी के दोनों तट पर खड़े हैं निशाचर, सुदूर बांस वन में अग्नि रेखा सुलगती सी, कोई नहीं रखता यहाँ दीवार पार की ख़बर, नगर कीर्तन चलता रहता है ...
-
कुछ भी नहीं बदला हमारे दरमियां, वही कनखियों से देखने की अदा, वही इशारों की ज़बां, हाथ मिलाने की गर्मियां, बस दिलों में वो मिठास न रही, बिछुड़ ...
-
जिसे लोग बरगद समझते रहे, वो बहुत ही बौना निकला, दूर से देखो तो लगे हक़ीक़ी, छू के देखा तो खिलौना निकला, उसके तहरीरों - से बुझे जंगल की आग, दोब...
-
उम्र भर जिनसे की बातें वो आख़िर में पत्थर के दीवार निकले, ज़रा सी चोट से वो घबरा गए, इस देह से हम कई बार निकले, किसे दिखाते ज़ख़्मों के निशां, क...
-
तुम्हें संवारने की चाह में हज़ार बार उजड़ा है मेरे अंदर का उपवन, न जाने किन रास्तों से हो कर गुज़री है ज़िन्दगी, कभी वक़्त मिले तो देख लेना प्रणय...
-
शेष प्रहर के स्वप्न होते हैं बहुत - ही प्रवाही, मंत्रमुग्ध सीढ़ियों से ले जाते हैं पाताल में, कुछ अंतरंग माया, कुछ सम्मोहित छाया, प्रेम, ग्ला...
-
दो चाय की प्यालियां रखी हैं मेज़ के दो किनारे, पड़ी सी है बेसुध कोई मरू नदी दरमियां हमारे, तुम्हारे - ओंठों पे आ कर रुक जाती हैं मृगतृष्णा, पल...
-
ये हथेलियों की है ज्यामिति इसे समझना आसां नहीं, चाहता है दिल बहुत कुछ, कहने को बाक़ी अरमां नहीं। लब ए बाम पर, कई चिराग़ ए शाम लोग जलाए बैठे है...
-
चला जा रहा हूँ निस्र्द्देश्य रास्तों से अंतहीन है समुद्र का किनारा, उतरे तो सही वो एक बार घने बादलों के हमराह, उभर जाए कदाचित डूबा हुआ साँझ ...

बहुत दर्द है इस कविता में। जो ऐसे दर्द से गुज़रा हो, वही इसके भाव को ठीक से समझ सकता है।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबहुत सुन्दर शब्द चयन , सुन्दर भाव पूर्ण रचना
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएं