लौट गए उसी ईशान कोणीय देश में,
सभी मेघ दल, जहाँ से उड़ कर
थे वो आए, छोड़ गए छत
के किनारों पर शैवालों
के हरित प्रदेश,
जो बहुत
जल्दी
ही
सूख जाएंगे, समय का मरहम भर -
जाता है दर्द की गहराइयां, कोई
किसी के लिए नहीं रुकता,
बादलों की तरह लोग
छोड़ जाते हैं कुछ
पलों के लिए
अपने गीले
निशान,
फिर
सुदूर वादियों में शरद देता है दस्तक,
सज उठता है अरण्य पुष्पों से
सारा परिवेश, लौट गए
उसी ईशान कोणीय
देश में, सभी मेघ
दल, जहाँ से
उड़ कर
थे वो
आए, छोड़ गए छत के किनारों पर - -
शैवालों के हरित प्रदेश।
* *
- - शांतनु सान्याल
13 अगस्त, 2021
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आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज सुक्रवार 13 अगस्त 2021 शाम 5.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबदलते हुए मौसम की गाथा कहती हुई सुंदर रचना |
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंसमय का मरहम भर -
जवाब देंहटाएंजाता है दर्द की गहराइयां, कोई
किसी के लिए नहीं रुकता,
बादलों की तरह लोग
छोड़ जाते हैं कुछ
पलों के लिए
अपने गीले
निशान।
बहुत गहन संवेदना समेटे प्रतीकात्मक रचना ।
अप्रतिम।
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंअतुल्य बिम्बों की तूलिका से सजा हुआ एक रूहानी शब्द-चित्र ...
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा आज शनिवार (१४-०८-२०२१) को
"जो करते कल्याण को, उनका होता मान" चर्चा अंक-४१५६ (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक') पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
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