18 अगस्त, 2021

सत्य का स्वाद - -

किसी अंध मोह के लिए मैं धृतराष्ट्र
नहीं बन सकता, साथ चलना
हो ग़र तुम्हें, उतार फेंकों
अंधकार की पट्टी,
ये पथ है शूलों
से भरा, ये
कोई
अंतःपुर नहीं है, अनायास ही हर एक
बात पर हामी न भरो, एक बार
नहीं हज़ार बार, अधर्म का
प्रतिकार करो, अपने
अंतर्मन के प्रश्नों
को अनवरत
धारदार
करो,
सत्य का स्वाद माना कि मधुर नहीं
है, ये पथ है शूलों से भरा, ये कोई
अंतःपुर नहीं है। मुझे नहीं
चाहिए सामूहिक आत्म -
हनन का रास्ता
अंतिम सांस
तक मैं
अन्याय का प्रतिवाद करूंगा, मृत्यु
को आने दो प्रकृत रूप से, जीने
के लिए ज़रूरी नहीं कि आँख  
मूँद कर हर एक शर्त को
स्वीकार कर लिया
जाए, विवेक
के पत्थर
को
हर हाल में सान दूंगा, माना की - -
इस पथ पर चलना कठिन
है लेकिन दूभर नहीं
है, ये पथ है
शूलों से
भरा, ये कोई अंतःपुर नहीं है, सत्य
का स्वाद माना कि मधुर
नहीं है।
* *
- - शांतनु सान्याल
 

24 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत अच्छी अभिव्यक्ति है यह शांतनु जी आपकी। मैं बस इतना ही कहूंगा कि अगर दूभर भी हो इस पथ पर चलना तो भी चलने वाले चलते हैं और इसी कारण से यह संसार अभी तक नष्ट होने से बचा हुआ है।

    जवाब देंहटाएं
  2. आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" पर गुरुवार 19 अगस्त 2021 को लिंक की जाएगी ....

    http://halchalwith5links.blogspot.in
    पर आप सादर आमंत्रित हैं, ज़रूर आइएगा... धन्यवाद!

    !

    जवाब देंहटाएं
  3. जीने के लिए ज़रूरी नहीं कि आँख मूँद कर हर एक शर्त को स्वीकार कर लिया जाए"
    बहुत सुंदर !

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर! जीवन मूल्यों का मूल्याकंन करती रचना ।
    सही कहा आपने धृतराष्ट्र जैसा जीवन सिर्फ प्रश्न के घेरे में रहता है अस्तित्व विहीन।

    जवाब देंहटाएं
  5. सारगर्भित सृजन । जीवन संदर्भ का सुंदर चिंतन।

    जवाब देंहटाएं
  6. जीवन मूल्यों को दर्शाती सुंदर रचना।

    जवाब देंहटाएं
  7. वाह!हमेशा की तरह लाज़वाब सृजन।
    सादर

    जवाब देंहटाएं
  8. आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।

    जवाब देंहटाएं
  9. आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।

    जवाब देंहटाएं
  10. जीने
    के लिए ज़रूरी नहीं कि आँख
    मूँद कर हर एक शर्त को
    स्वीकार कर लिया जाए
    बहुत सुंदर रचना। गहन विचारों को राह देते हुई सभी पंक्तियाँ।

    जवाब देंहटाएं

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past