17 मई, 2026

मातृ रूपेण संस्थिता - -

विभेद नहीं करता कभी मातृस्तन,

फिर भी हम छोड़ नहीं पाते
विष दंशन,जो वृक्ष देता
है जीवन दान वही
एक दिन होता
है बलिदान,
काश हम
इस
देश की माटी में देख पाते हृदय
स्पंदन, विभेद नहीं करता
कभी मातृस्तन । तुम
आज भी तलाश
करते हो
परकीय
मिट्टी
में
अपना ईश, जबकि तुम्हारा सारा
अस्तित्व है इसी देश के बीच,
इसी धरातल के गर्भ में
बिखरना है हम सब
को एक दिन,
इसी धूल
में है
समाहित स्वाधीनता का रक्त चंदन,
इस माटी से बढ़ कर नहीं
कोई जीवन मरण
का अटूट
बंधन,
विभेद नहीं करता कभी मातृस्तन ।
- - शांतनु सान्याल

14 मई, 2026

प्रतिच्छाया - -

यूँ तो मेरे पास अपना कुछ भी नहीं, आजन्म निःस्वता ही

है मेरी पहचान, फिर
भी वो कहते हैं
मेरे पास
है अंतहीन सपनों की ज़मीन
और एक मुट्ठी भर
आसमान,
आजन्म
निःस्वता ही है मेरी पहचान ।
यूँ तो मेरा अपना नहीं
कोई स्थायी निवास,
न कोई पता -
ठिकाना,
एक
अंतहीन अन्तर्यात्रा, न कोई सीमा
न कंटक तार, देह से हो कर
प्राण प्रदेश अनवरत
आत्म उड़ान,
आजन्म
निःस्वता ही है मेरी पहचान । यूँ तो
तो भीड़ में गुम हूँ फिर भी वो
कहते हैं उनके दिल के
क़रीब हूँ, आईने से
डर लगता है
फिर भी
देखता हूँ ख़ुद को उलंग, कोहरे के स्नानागार में, बस इसी एक
बिंदु पर आकर हो जाता
है सभी मोह का महा
अवसान, आजन्म
निःस्वता ही है
मेरी पहचान ।
- - शांतनु सान्याल

13 मई, 2026

अग्नि बीज - -

यहाँ नगर संकीर्तन है यथावत  अष्टप्रहर, तथापि बाती

स्तम्भ समझ नहीं
पाते अंतर्तम
का अंध
स्वर,
इस द्वार पर सूर्य नहीं उगता ले कर नया ख़बर, फिर भी एक नारी
अपने अंचल में बोती है
अग्नि बीज, इस गाँव
का बूढ़ा बरगद
शाम ढले
लेता
है दीर्घ निःस्वास, फिर भी एक क्लांत युवा नर संवारता है
टूटा हुआ नीड़, अपनों
को सहेजता है
अपने
वक्षःस्थल के आसपास,जो लोग
दख़ल करते हैं नीलाकाश
उनके पास होती है केवल
सामयिक मियाद,
सूर्य को हर
हाल में
निकलना है तोड़ के तमाम मेघ
प्रतिरोध, महल, चौबारा,
दाम्भिक पिटारा सब
कुछ बिखर जाता
है पल में जब
जागृत हों
समवेत
कंठ
स्वर, यहाँ नगर संकीर्तन है यथावत अष्टप्रहर ।
- - शांतनु सान्याल

11 मई, 2026

अकस्मात कभी - -

ईशान कोण के उस पार है कहीं

तुम्हारा ठिकाना, ज़िन्दगी
इधर है बस एक सूखी
नदी, रेत पत्थरों के
बीच खोए स्रोत
को तलाशती
हुई, हो
सके
कभी तो अनायास ही बरस जाना, ईशान कोण के
उस पार है कहीं
तुम्हारा
ठिकाना । अभी बहुत दूर है मुहाने का प्रकाश स्तंभ,
पहाड़, तलहटी, ग्राम
शहर, पुरातन
मंदिर,
उदास से खड़े हैं दोनों पार असंख्य आशातीत 
खंडहर, तृषित
अधरों को
हे मेघ
कभी तो सजलता दिलाना, ईशान कोण के उस
पार है कहीं
तुम्हारा
ठिकाना, अनाहूत सांझ वृष्टि की तरह अंतरतम तक कभी
हो सके तो बिखर
जाना ।
- - शांतनु सान्याल
  

01 मई, 2026

असमाप्त इंतज़ार - -

सिमटते जलस्रोत के नीचे जमी हुई है काई,
समय के सतह पर तैरती सी लगे है परछाई,

तट के ऊँचे ऊँचे दरख़्त किस काम के भला,
दे न सके ज़रा सी राहत कहने को अगुआई,

आज भी है जारी रेत के नीचे जल की खोज,
कई दशक गुज़रे लेकिन हालत न सुधर पाई,

झर चुके महुआ पलाश, प्राण में अधूरी प्यास,
ज़रा कोई बताए जीने की ख़बर कहाँ से आई,

चाँदनी है बेअसर ग़र जिस्म हो तपता बियाबाँ,
यहाँ छत नहीं मयस्सर वहां ताजमहल बनवाई,

सभी हैं मुन्तज़िर, उस ख़ुशनुमा सुबह के लिए,
उम्र गुज़री राह तकते लेकिन कुछ ख़बर न आई,
- - शांतनु सान्याल


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