सिमटते जलस्रोत के नीचे जमी हुई है काई,
समय के सतह पर तैरती सी लगे है परछाई,
तट के ऊँचे ऊँचे दरख़्त किस काम के भला,
दे न सके ज़रा सी राहत कहने को अगुआई,
आज भी है जारी रेत के नीचे जल की खोज,
कई दशक गुज़रे लेकिन हालत न सुधर पाई,
झर चुके महुआ पलाश, प्राण में अधूरी प्यास,
ज़रा कोई बताए जीने की ख़बर कहाँ से आई,
चाँदनी है बेअसर ग़र जिस्म हो तपता बियाबाँ,
यहाँ छत नहीं मयस्सर वहां ताजमहल बनवाई,
सभी हैं मुन्तज़िर, उस ख़ुशनुमा सुबह के लिए,
उम्र गुज़री राह तकते लेकिन कुछ ख़बर न आई,
- - शांतनु सान्याल
