14 मई, 2026

प्रतिच्छाया - -

यूँ तो मेरे पास अपना कुछ भी नहीं, आजन्म निःस्वता ही

है मेरी पहचान, फिर
भी वो कहते हैं
मेरे पास
है अंतहीन सपनों की ज़मीन
और एक मुट्ठी भर
आसमान,
आजन्म
निःस्वता ही है मेरी पहचान ।
यूँ तो मेरा अपना नहीं
कोई स्थायी निवास,
न कोई पता -
ठिकाना,
एक
अंतहीन अन्तर्यात्रा, न कोई सीमा
न कंटक तार, देह से हो कर
प्राण प्रदेश अनवरत
आत्म उड़ान,
आजन्म
निःस्वता ही है मेरी पहचान । यूँ तो
तो भीड़ में गुम हूँ फिर भी वो
कहते हैं उनके दिल के
क़रीब हूँ, आईने से
डर लगता है
फिर भी
देखता हूँ ख़ुद को उलंग, कोहरे के स्नानागार में, बस इसी एक
बिंदु पर आकर हो जाता
है सभी मोह का महा
अवसान, आजन्म
निःस्वता ही है
मेरी पहचान ।
- - शांतनु सान्याल

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