13 मई, 2026

अग्नि बीज - -

यहाँ नगर संकीर्तन है यथावत  अष्टप्रहर, तथापि बाती

स्तम्भ समझ नहीं
पाते अंतर्तम
का अंध
स्वर,
इस द्वार पर सूर्य नहीं उगता ले कर नया ख़बर, फिर भी एक नारी
अपने अंचल में बोती है
अग्नि बीज, इस गाँव
का बूढ़ा बरगद
शाम ढले
लेता
है दीर्घ निःस्वास, फिर भी एक क्लांत युवा नर संवारता है
टूटा हुआ नीड़, अपनों
को सहेजता है
अपने
वक्षःस्थल के आसपास,जो लोग
दख़ल करते हैं नीलाकाश
उनके पास होती केवल
सामयिक मियाद,
सूर्य को हर
हाल में
निकलना है तोड़ के तमाम मेघ
प्रतिरोध, महल, चौबारा,
दाम्भिक पिटारा सब
कुछ बिखर जाता
है पल में जब
जागृत हों
समवेत
कंठ
स्वर, यहाँ नगर संकीर्तन है यथावत अष्टप्रहर ।
- - शांतनु सान्याल

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