ईशान कोण के उस पार है कहीं तुम्हारा ठिकाना, ज़िन्दगी
इधर है बस एक सूखी
नदी, रेत पत्थरों के
बीच खोए स्रोत
को तलाशती
हुई, हो
सके
कभी तो अनायास ही बरस जाना, ईशान कोण के
उस पार है कहीं
तुम्हारा
ठिकाना । अभी बहुत दूर है मुहाने का प्रकाश स्तंभ,
पहाड़, तलहटी, ग्राम
शहर, पुरातन
मंदिर,
उदास से खड़े हैं दोनों पार असंख्य आशातीत
खंडहर, तृषित
अधरों को
हे मेघ
कभी तो सजलता दिलाना, ईशान कोण के उस
पार है कहीं
तुम्हारा
ठिकाना, अनाहूत सांझ वृष्टि की तरह अंतरतम तक कभी
हो सके तो बिखर
जाना ।
- - शांतनु सान्याल

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