17 मई, 2026

मातृ रूपेण संस्थिता - -

विभेद नहीं करता कभी मातृस्तन,

फिर भी हम छोड़ नहीं पाते
विष दंशन,जो वृक्ष देता
है जीवन दान वही
एक दिन होता
है बलिदान,
काश हम
इस
देश की माटी में देख पाते हृदय
स्पंदन, विभेद नहीं करता
कभी मातृस्तन । तुम
आज भी तलाश
करते हो
परकीय
मिट्टी
में
अपना ईश, जबकि तुम्हारा सारा
अस्तित्व है इसी देश के बीच,
इसी धरातल के गर्भ में
बिखरना है हम सब
को एक दिन,
इसी धूल
में है
समाहित स्वाधीनता का रक्त चंदन,
इस माटी से बढ़ कर नहीं
कोई जीवन मरण
का अटूट
बंधन,
विभेद नहीं करता कभी मातृस्तन ।
- - शांतनु सान्याल

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