30 जुलाई, 2026

अन्तर प्लावन - -

पृथ्वी और आकाश जब एकाकार, सघन गाढ़ अंधकार, मर्म को

स्पर्श करती हुई आदिम
बरसात, टूट जाते हैं
शीशे के सभी
दीवार, रोके
रुकते
नहीं
विक्षिप्त अभिलाषित जलधार, पृथ्वी और आकाश जब एकाकार । सब
कुछ बह जाता है क्षण में हम
देखते रह जाते हैं अवाक,
उन निःशब्द पलों में
जीवन पा जाता
है आत्म सुख
अपरम्पार,
इस
असीम डूब में निहित है सारा संसार,
पृथ्वी और आकाश जब
एकाकार ।
-- शांतनु सान्याल

26 जुलाई, 2026

अनंत प्यास - -

मुँडेर से उतरती धूप की तरह क्रमशः

सभी संपर्क के बेल बूटे फ़िके हो
गए, फिर भी आसान नहीं
होता पुराने कपड़ों को
फेंक देना, यूँ लगे
बरसों से तन
में लगते
लगते
अंतिम पलों तक हम किसी के हो गए, 
मुँडेर से उतरती धूप की
तरह क्रमशः सभी संपर्क के
बेल बूटे फ़िके हो गए ।
मायावी तंतुओं
में गुथी
रहती है दीर्घ जीने की अदम्य चाहत,
पुरातन जीर्ण शीर्ण पोशाक को
बार बार छु कर देखने की
अभिलाषा, पुनरपि
जननं पुनरपि
मरणम्:  ये
जान कर
भी मिटती नहीं अनंत तियासा, दुःख
सुख के स्रोत मुहाने में एक सरीखे
हो गए, मुँडेर से उतरती धूप
की तरह क्रमशः सभी
संपर्क के बेल बूटे
फ़िके हो
गए ।
- शांतनु सान्याल

15 जुलाई, 2026

पारदर्शी पुल - -

कुछ और ही था हृदयस्थ हमारे कुछ और

ही तुम ने सोचा अभिप्राय, पारदर्शी
पुल के नीचे समय स्रोत अपनी
धुन में बहता जाय, कुछ
और ही थी जीवन
की रेशम सी
अभिलाषा,
तितली
के पंखों में आंकी थी कभी सप्तरंगी आशा,
समुद्र सैकत में बिखरे पड़े हैं अब कुछ
मृत सीप निरुपाय,पारदर्शी पुल
के नीचे समय स्रोत अपनी
धुन में बहता जाय ।
न जाने कितने
रेत के घर
ढह
जाते हैं लहरों को उसकी ख़बर नहीं होती,
जी उठते हैं फिर भी आदिम जीवाश्म
सभी सुबह की दस्तक से, इस
रात की कोई अंतिम डगर
नहीं होती, गुज़र जाते
हैं उजालों के
काफ़िलें
तकता
रह
जाता है शून्य आँखों से जीवन सराय, पारदर्शी पुल के नीचे समय स्रोत अपनी
धुन में बहता जाय ।
- -शांतनु सान्याल

03 जुलाई, 2026

बहाव - -


ज़िन्दगी और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह जाता है
आख़िर में सुनसान
रास्ते के सिवा
कुछ भी
नहीं
होता, सूख जाते हैं सभी सजल
एहसास, वक़्त भर जाता
है ख़ालीपन का सुरंग,
कारवां बढ़ जाता
है बहोत आगे
सितारों
के हमराह, तन्हा मुसाफ़िर बहोत
पीछे रह जाता है, ज़िन्दगी
और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह
जाता है ।
वो
तमाम हसरतें रहती हैं संदूक के
अन्दर बंद कोरे कपड़ों की
तरह, पहुँचने से पहले
ही उठ जाता है जश्न
ए उजाला, फिर
भी जीने की
आस ले
जाती
है हमें सुबह के मुहाने तक, एक
नए दिन का आगाज़ ख़ामोश
हो कर भी बहुत कुछ कह
जाता है, ज़िन्दगी
और मौत के
दरमियाँ
बहोत
कुछ बह जाता है - - - - - - -
- - शांतनु सान्याल


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