15 जुलाई, 2026

पारदर्शी पुल - -

कुछ और ही था हृदयस्थ हमारे कुछ और

ही तुम ने सोचा अभिप्राय, पारदर्शी
पुल के नीचे समय स्रोत अपनी
धुन में बहता जाय, कुछ
और ही थी जीवन
की रेशम सी
अभिलाषा,
तितली
के पंखों में आंकी थी कभी सप्तरंगी आशा,
समुद्र सैकत में बिखरे पड़े हैं अब कुछ
मृत सीप निरुपाय,पारदर्शी पुल
के नीचे समय स्रोत अपनी
धुन में बहता जाय ।
न जाने कितने
रेत के घर
ढह
जाते हैं लहरों को उसकी ख़बर नहीं होती,
जी उठते हैं फिर भी आदिम जीवाश्म
सभी सुबह की दस्तक से, इस
रात की कोई अंतिम डगर
नहीं होती, गुज़र जाते
हैं उजालों के
काफ़िलें
तकता
रह
जाता है शून्य आँखों से जीवन सराय, पारदर्शी पुल के नीचे समय स्रोत अपनी
धुन में बहता जाय ।
- -शांतनु सान्याल

03 जुलाई, 2026

बहाव - -


ज़िन्दगी और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह जाता है
आख़िर में सुनसान
रास्ते के सिवा
कुछ भी
नहीं
होता, सूख जाते हैं सभी सजल
एहसास, वक़्त भर जाता
है ख़ालीपन का सुरंग,
कारवां बढ़ जाता
है बहोत आगे
सितारों
के हमराह, तन्हा मुसाफ़िर बहोत
पीछे रह जाता है, ज़िन्दगी
और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह
जाता है ।
वो
तमाम हसरतें रहती हैं संदूक के
अन्दर बंद कोरे कपड़ों की
तरह, पहुँचने से पहले
ही उठ जाता है जश्न
ए उजाला, फिर
भी जीने की
आस ले
जाती
है हमें सुबह के मुहाने तक, एक
नए दिन का आगाज़ ख़ामोश
हो कर भी बहुत कुछ कह
जाता है, ज़िन्दगी
और मौत के
दरमियाँ
बहोत
कुछ बह जाता है - - - - - - -
- - शांतनु सान्याल


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