03 जुलाई, 2026

बहाव - -


ज़िन्दगी और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह जाता है
आख़िर में सुनसान
रास्ते के सिवा
कुछ भी
नहीं
होता, सूख जाते हैं सभी सजल
एहसास, वक़्त भर जाता
है ख़ालीपन का सुरंग,
कारवां बढ़ जाता
है बहोत आगे
सितारों
के हमराह, तन्हा मुसाफ़िर बहोत
पीछे रह जाता है, ज़िन्दगी
और मौत के दरमियाँ
बहोत कुछ बह
जाता है ।
वो
तमाम हसरतें रहती हैं संदूक के
अन्दर बंद कोरे कपड़ों की
तरह, पहुँचने से पहले
ही उठ जाता है जश्न
ए उजाला, फिर
भी जीने की
आस ले
जाती
है हमें सुबह के मुहाने तक, एक
नए दिन का आगाज़ ख़ामोश
हो कर भी बहुत कुछ कह
जाता है, ज़िन्दगी
और मौत के
दरमियाँ
बहोत
कुछ बह जाता है - - - - - - -
- - शांतनु सान्याल


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