18 अगस्त, 2026

धुंधले शब्दों के परे - -

नदी के दोनों किनारों की है अपनी

ही एक अलग कहानी, एक
तरफ जनशून्यता, दूसरी
ओर अंतहीन कोलाहल,
लहरों में बहते हुए
कुछ फूल, बुझे
हुए धूप की
काठी पर
प्रणय
गंध
की है धुँधली सी निशानी, नदी के 
दोनों किनारों की है अपनी ही
एक अलग कहानी । कोई
न था दूर तक, पीछे
मुड़ कर देखना
रहा अर्थहीन,
गहराइयों
में रहते
रहते
जीवन हो जाता है अंध मीन, उसे
पता नहीं चल पाता सतह की
परेशानी, नदी के दोनों
किनारों की है
अपनी ही
एक
अलग कहानी । उस मोह के धागों
में उलझे दिवा रात्रि शलभ सम
निरीह जीवन, अंतिम पहर
शून्य हथेली, कुछ भी
नहीं होता करने
को अर्पण,
दीर्घ
निश्वास के संग समाप्ति की ओर
तब नगर भ्रमण, धुंधले शब्दों
के नेपथ्य में कहीं दूर तब
कविता जानी पहचानी,
नदी के दोनों किनारों
की है अपनी ही
एक अलग
कहानी ।
- - शांतनु सान्याल

13 अगस्त, 2026

आंशिक सत्य - -

कुछ सत्य था, कुछ इंद्रधनुष !

समझ पाना था कठिन
आख़िर जीवन रहा
इतने दिन किस
के हस्तगत,
उजाले
और
अंधेरे के मध्य खोजता रहा पसंद 
अपनी, हालांकि चाहतें जीती
रहीं किसी और के मातहत,
समझ पाना था कठिन
आख़िर जीवन रहा
इतने दिन किस
के हस्तगत ।
कुछ महज़
ख़्वाब
थे आसमानी, कुछ प्रेम बेहिसाबी,
सोच ही न पाए दरअसल हम
हैं आख़िर किस पथ के
अनुगामी, दौड़ते
रहे बेतहाशा
परछाइयों
के पीछे
अनवरत, समझ पाना था कठिन
आख़िर जीवन रहा
इतने दिन किस
के हस्तगत ।
- - शांतनु सान्याल

06 अगस्त, 2026

अंतर्ध्वनि - -

तारों का टूटना और बिखरना 
अनादिकाल से 
है जारी,
आकाश निहारता है
चिर निर्विकार,
दिवा स्वप्न
विलासी
ये जीवन चाहे आलोकमय
चंद्रहार, कोई नहीं जाने
कल प्रस्थान की है
किस की बारी,
तारों का
टूटना
और बिखरना अनादिकाल से है
जारी । अशेष नक्षत्रों में जिसे
खोजते हैं वो प्रकाश बिंदु
छुपा रहता है अंतरतम
में कहीं, वो मोती
जो त्रिलोक
में भर
दे
अविरल आलोक, कदाचित
मिलता है हृदयस्थ
गहनतम में
कहीं,
वो महत दाता हो कर भी रहता
है सदा प्रणय भिखारी, तारों
का टूटना और बिखरना
अनादिकाल से
है जारी ।
- - शांतनु सान्याल 

01 अगस्त, 2026

अंतिम बूंद - -

ईथर की तरह विलीन हो जाएंगे

एक दिन सभी अंतर के सुप्त
दहन, उम्र से लंबी  है
चाहतों का
सूचीपत्र,
अंतिम
बिंदु में भी लगे ठहरा हुआ सा
ख़्वाहिशों का एक बूंद इत्र,
सभी लोग हैं बंधे हुए
अदृश्य डोर से
न कोई
यहां
किसी का चिर बैरी न कोई गहरा मित्र, सब 
कुछ नियति के
हाथों में, क्या प्रारब्ध
क्या अन्त्य मिलन,
ईथर की तरह
विलीन हो
जाएंगे
एक
दिन सभी अंतर के सुप्त दहन ।
- - शांतनु सान्याल




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