18 अगस्त, 2026

धुंधले शब्दों के परे - -

नदी के दोनों किनारों की है अपनी

ही एक अलग कहानी, एक
तरफ जनशून्यता, दूसरी
ओर अंतहीन कोलाहल,
लहरों में बहते हुए
कुछ फूल, बुझे
हुए धूप की
काठी पर
प्रणय
गंध
की है धुँधली सी निशानी, नदी के 
दोनों किनारों की है अपनी ही
एक अलग कहानी । कोई
न था दूर तक, पीछे
मुड़ कर देखना
रहा अर्थहीन,
गहराइयों
में रहते
रहते
जीवन हो जाता है अंध मीन, उसे
पता नहीं चल पाता सतह की
परेशानी, नदी के दोनों
किनारों की है
अपनी ही
एक
अलग कहानी । उस मोह के धागों
में उलझे दिवा रात्रि शलभ सम
निरीह जीवन, अंतिम पहर
शून्य हथेली, कुछ भी
नहीं होता करने
को अर्पण,
दीर्घ
निश्वास के संग समाप्ति की ओर
तब नगर भ्रमण, धुंधले शब्दों
के नेपथ्य में कहीं दूर तब
कविता जानी पहचानी,
नदी के दोनों किनारों
की है अपनी ही
एक अलग
कहानी ।
- - शांतनु सान्याल

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