गुरुवार, 22 जुलाई 2021

दूरबीनी नज़र - -

ये हथेलियों की है ज्यामिति
इसे समझना आसां
नहीं, चाहता है
दिल बहुत
कुछ,
कहने को बाक़ी अरमां नहीं।
लब ए बाम पर, कई
चिराग़ ए शाम
लोग जलाए
बैठे हैं,
रंगीन बुलबुलों का है मंज़र
ये उजला कोई आसमां
नहीं। जी चाहे किसी
भी नाम से
पुकारो,
बहता हुआ दरिया हूँ, ज़ब्त
करना मुझे आता है
यूँ तो कोई मेरा
निगह्बां
नहीं।
क़ौमियत का मोहर जो -
भी हो, परिंदों का
मज़हब है एक,
इस आलम

आवारगी के लिए कोई
ख़ास कारवां नहीं।
सोचो तो सारी
दुनिया है
घर
अपना वरना कुछ भी नहीं,
कोई भी नहीं मुबारक
सौ फ़ीसद, आज
हैं, कल यहाँ
नहीं।
इस भीड़ भरे भूल भुलैया में
न पा सकोगे गुमशुदा
मोती, दूरबीन से
लगते हैं सभी
बहुत
नज़दीक, ये दिल की ज़मीं है
यहाँ मुझसा कोई
तनहा नहीं।

* *
- - शांतनु सान्याल  
 
 






21 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार,
    आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार (23-07-2021) को "इंद्र-धनुष जो स्वर्ग-सेतु-सा वृक्षों के शिखरों पर है" (चर्चा अंक- 4134) पर होगी। चर्चा में आप सादर आमंत्रित हैं।
    धन्यवाद सहित।

    "मीना भारद्वाज"

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  2. सोचो तो सारी दुनिया है घर वरना तो कुछ भी नहीं!वाह! बहुत खूब!सादर शुभकामनाये।

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  3. चाहता है
    दिल बहुत
    कुछ,
    कहने को बाक़ी अरमां नहीं।
    लब ए बाम पर, कई
    चिराग़ ए शाम
    लोग जलाए
    बैठे हैं,
    रंगीन बुलबुलों का है मंज़र
    ये उजला कोई आसमां
    नहीं।


    बहुत सुन्दर प्रस्तुति... कहा भी गया है की असल में हर व्यक्ति अपने में एक जजीरा है..अकेलेपन के समुंदर से घिरा हुआ....

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  4. बहता हुआ दरिया हूँ, ज़ब्त
    करना मुझे आता है
    यूँ तो कोई मेरा
    निगह्बां
    नहीं।
    बहुत खूबसूरत लेखन ।

    जवाब देंहटाएं

  5. कहने को बाक़ी अरमां नहीं।
    लब ए बाम पर, कई
    चिराग़ ए शाम
    लोग जलाए
    बैठे हैं,
    सुंदर सृजन सर,सादर नमन आपको

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  6. बहुत बहुत सुन्दर सराहनीय रचना |

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  7. इस भीड़ भरे भूल भुलैया में
    न पा सकोगे गुमशुदा
    मोती, दूरबीन से
    लगते हैं सभी
    बहुत
    नज़दीक, ये दिल की ज़मीं है
    यहाँ मुझसा कोई
    तनहा नहीं।वाह,नायाब सृजन।

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  8. बहुत ही सुंदर सराहनीय सृजन।
    सादर

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