अंजाम ए अदब है बेमानी,
जब हाकिम ही बज़्म
ए नशीं हो जाए,
कहाँ जा
इल्तिजा लिखवाएं, जब
मुंसिफ़ ही नुक्ता चीं
हो जाए। अपने
ही शहर में
फिरता
है वो
किसी अनजान मुहाजिर की
तरह, कौन पहचानेगा
उसे, जो शख़्स
अपने ही
घर में
अजनबी हो जाए। लख़्त ए
जिगर की ता'रीफ़ में,
तमाम अल्फ़ाज़ हैं
गोया गुमशुदा,
ख़ुद से
बाहर
निकल कर देखें, शायद
आसां ये ज़िन्दगी हो
जाए। ब 'अक्स
ए आइने के,
अंदर का
आदमी पहचानना नहीं आसां,
तन्हाइयों में ख़ुद के सामने
हों ख़ुद बरहना कुछ तो
जवाबदेही हो
जाए।
* *
- - शांतनु सान्याल
24 जुलाई, 2021
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past
-
नेपथ्य में कहीं खो गए सभी उन्मुक्त कंठ, अब तो क़दमबोसी का ज़माना है, कौन सुनेगा तेरी मेरी फ़रियाद - - मंचस्थ है द्रौपदी, हाथ जोड़े हुए, कौन उठेग...
-
मृत नदी के दोनों तट पर खड़े हैं निशाचर, सुदूर बांस वन में अग्नि रेखा सुलगती सी, कोई नहीं रखता यहाँ दीवार पार की ख़बर, नगर कीर्तन चलता रहता है ...
-
जिसे लोग बरगद समझते रहे, वो बहुत ही बौना निकला, दूर से देखो तो लगे हक़ीक़ी, छू के देखा तो खिलौना निकला, उसके तहरीरों - से बुझे जंगल की आग, दोब...
-
कुछ भी नहीं बदला हमारे दरमियां, वही कनखियों से देखने की अदा, वही इशारों की ज़बां, हाथ मिलाने की गर्मियां, बस दिलों में वो मिठास न रही, बिछुड़ ...
-
उम्र भर जिनसे की बातें वो आख़िर में पत्थर के दीवार निकले, ज़रा सी चोट से वो घबरा गए, इस देह से हम कई बार निकले, किसे दिखाते ज़ख़्मों के निशां, क...
-
तुम्हें संवारने की चाह में हज़ार बार उजड़ा है मेरे अंदर का उपवन, न जाने किन रास्तों से हो कर गुज़री है ज़िन्दगी, कभी वक़्त मिले तो देख लेना प्रणय...
-
शेष प्रहर के स्वप्न होते हैं बहुत - ही प्रवाही, मंत्रमुग्ध सीढ़ियों से ले जाते हैं पाताल में, कुछ अंतरंग माया, कुछ सम्मोहित छाया, प्रेम, ग्ला...
-
दो चाय की प्यालियां रखी हैं मेज़ के दो किनारे, पड़ी सी है बेसुध कोई मरू नदी दरमियां हमारे, तुम्हारे - ओंठों पे आ कर रुक जाती हैं मृगतृष्णा, पल...
-
ये हथेलियों की है ज्यामिति इसे समझना आसां नहीं, चाहता है दिल बहुत कुछ, कहने को बाक़ी अरमां नहीं। लब ए बाम पर, कई चिराग़ ए शाम लोग जलाए बैठे है...
-
कुछ स्मृतियां बसती हैं वीरान रेलवे स्टेशन में, गहन निस्तब्धता के बीच, कुछ निरीह स्वप्न नहीं छू पाते सुबह की पहली किरण, बहुत कुछ रहता है असमा...

ब 'अक्स
जवाब देंहटाएंए आइने के,
अंदर का
आदमी पहचानना नहीं आसां,
तन्हाइयों में ख़ुद के सामने
हों ख़ुद बरहना कुछ तो
जवाबदेही हो
जाए।..बिलकुल सही कहा आपने,लाजवाब गजल।
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
जवाब देंहटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार(२५-०७-२०२१) को
'सुनहरी धूप का टुकड़ा.'(चर्चा अंक-४१३६) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंआदमी पहचानना नहीं आसां,
जवाब देंहटाएंतन्हाइयों में ख़ुद के सामने
हों ख़ुद बरहना कुछ तो
जवाबदेही हो
जाए।--गहरी पंक्तियां।
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंशायद इसिलिये किसी शायर ने लिखा है हर आदमी में रहते है दो चार आदमी । अंदर के आदमी को पहचानना नही आसान । बेजोड़ रचना
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएं