ठहाकों के नीचे हैं दफ़न अनगिनत
आहों के खंडहर, ज़रा सी खुदाई
न खोल जाए कहीं, राज़
ए पलस्तर। सीलन -
भरी रातों का
हिसाब
मांगती है ये ज़िन्दगी, टपकते हुए
छत को जवाब देते रहे ख़ाली
कनस्तर। ताउम्र घूमते
रहे पवनचक्की की
तरह अपने
आप,
ज़रा क्या रुके हम, लोग फेंकने
लगे ज़हर बुझे नश्तर। इक
अजीब कश्मकश से,
दो चार है वजूद
ए चिराग़,
सीने
में लिए हज़ार सिहरन जलता -
रहा कोई रातभर। सिरहाने
मेरे रात ढले, कौन
रख गया मीठी
सी छुअन,
ख़्वाहिश
ए जीस्त को जैसे मिल जाए - -
दुआ ए अस्तर। जाने
क्या क्या नहीं
करते हैं हम
पुरसुकूं
नींद
के वास्ते, आख़िर में वही - - -
आयताकार ज़मीं
होती है अपनी
बिस्तर।
* *
- - शांतनु सान्याल

यदि प्रकृति ने नींद ना बनाई होती तो इंसान का क्या हाल होता ! परेशानियों, दुखों, कष्टों से उसका वैसे ही अंत हो जाता !
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंजी नमस्ते ,
जवाब देंहटाएंआपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार(२४-०७-२०२१) को
'खुशनुमा ख़्वाहिश हूँ मैं !!'(चर्चा अंक-४१३५) पर भी होगी।
आप भी सादर आमंत्रित है।
सादर
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंजिंदगी की हकीकत बयां करती सुंदर रचना । जीवन का सुंदर चिंतन।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंकौन
जवाब देंहटाएंरख गया मीठी
सी छुअन,
ख़्वाहिश
ए जीस्त को जैसे मिल जाए - -
बहुत ही प्यारी रचना सर! वैश्या पर आधारित मेरी नई पोस्ट एक बार जरूर देखें🙏
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबेहतरीन रचना।
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबहुत सुंदर सृजन
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
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