उड़ सको, तो उड़ जाओ पिंजरा बंद
कभी न था, आँख के पैमाइश
से न देखो आसमां का
रंग, दिल की
अथाह
गहराइयों में, कोई तुम सा हसीं न
था। जब तलक तलातुम से न
हो मुलाक़ात, राज़ ए
समंदर रहता है
ग़ैर क़ाबिल
ए हल,
मुद्दतों बाद जब आईने को देखा
तो पाया, मुझसे बड़ा कोई
अजनबी न था, उड़
सको, तो उड़
जाओ
पिंजरा बंद कभी न था। निःशर्त
इस जहाँ में कोई भी लेन -
देन नहीं होता, सब
लफ़्ज़ों की है
जादूगरी
कोई
किसी के लिए बेवजह बेचैन नहीं
होता, कहने को वो मेरा था
हमनफ़स, लेकिन उसे
मुझ पर भी यक़ीं
न था, उड़
सको,
तो उड़ जाओ पिंजरा बंद कभी -
न था।
* *
- - शांतनु सान्याल

उड़
जवाब देंहटाएंसको,
तो उड़ जाओ पिंजरा बंद कभी -
न था।
आपकी रचनाओं में कमाल की ताजगी होती है।।।।। बेहतरीन। बहुत-बहुत शुभकामनाएँ आदरणीय शान्तनु जी।
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 01 अगस्त 2021 को साझा की गयी है.............. पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंहृदयस्पर्शी भाव !!
हटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंसब लफ़्ज़ों की है जादूगरी, कोई किसी के लिए बेवजह बेचैन नहीं होता। बहुत ख़ूब शांतनु जी!
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंमुझसे बड़ा कोई न था .....बहुत खूब
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
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