10 जून, 2026

पुनर्विन्यास - -

रेल पटरियों के उस पार बिखरी

पड़ी हैं टुकड़ों में दोपहर की
धूप, कुछ आगे पुल के
साए में टूटी पड़ी
है उम्र से कहीं
लंबी सांस,
अंतिम
रेलगाड़ी के गुज़रते ही सुनाई देती है एक अजीब सी दबी आहट,
सीने से उतर कर रूह की
गहराइयों तक सूखे
पत्तों की हो जैसे
सरसराहट,
महुआ
फूल
की तरह हम बीनते हैं टूटे सपनों
को, करते हैं सुबह से पहले
जीवन का पुनर्विन्यास,
कुछ आगे पुल के
साए में टूटी पड़ी
है उम्र से कहीं
लंबी सांस ।
चाँदनी
का स्पर्श था या छू कर आए हम रंगीन तितलियों के पर, न
जाने कौन रख गया
कुछ शिशिर बिंदु
पलकों के
ऊपर,
यद्यपि हाथों से छूट कर लुढ़क गया कोई अनमोल पत्थर,
दूर तक बिखरे पड़े हैं
गुलमोहर, फिर
आज हमें
हो चला
है पुनः जीने का एहसास, कुछ आगे पुल के
साए में टूटी पड़ी
है उम्र से कहीं
लंबी सांस ।
- - शांतनु सान्याल


1 टिप्पणी:

  1. आपकी कविता उदासी, टूटन और फिर से जीने की उम्मीद को बहुत खूबसूरती से सामने लाती है। आखिरी पंक्तियाँ खास तौर पर उम्मीद जगाती हैं कि खोने और टूटने के बाद भी जीने की चाह खत्म नहीं होती। बहरहाल, मेरा यहाँ आने का एक कारण और भी है। हम लोग मुंशी प्रेमचंद जी की आगामी पुण्यतिथी ३१ जुलाई २०२६ के अवसर पर प्रेमचंद महोत्सव के अंतर्गत "५० दिनों में ५० कहानियाँ" बनाने, सुनाने (और जुटाने की भी!) की ओर प्रयासरत है. अगर आपकी रूचि हो तो इस अभियान में आपका सहर्ष स्वागत है.

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