झील की गहराई में आकाश डूबा सा लगे, लौट कर उसे हम ने देखा है कई बार, ज़िन्दगी
कुछ नहीं एक अंधा
कुआं सा लगे,
न जाने
किस
तरह की हैं ये अस्पष्ट प्रतिध्वनियां,
दूर तक सिर्फ़ धुआं धुआं सा
लगे, ज़िन्दगी कुछ नहीं
एक अंधा कुआं सा
लगे । उम्र भर
आईने से
रही
दोस्ती, फिर भी दिल की बात दिल में ही रही, मेरा अक्स न जाने क्यूं आज बेजुबां सा लगे, ज़िन्दगी
कुछ नहीं एक अंधा कुआं
सा लगे । अंधेरे उजालों
की मिल्कियत अब
सहेज कर क्या
रखें, बस
रात
ढलने वाली है, वक़्त ओझल होता
कोई कारवां सा लगे, ज़िन्दगी
कुछ नहीं एक अंधा
कुआं सा लगे ।
- - शांतनु सान्याल

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