18 जुलाई, 2023

अक्स ए ज़िन्दगी - -

मुख़ातिब हो के भी था वो बहोत दूर, 
दरअसल वक़्त के पास ढलान
नहीं होता, नज़दीकियां
गिरह बन जाती हैं
अपने आप,
जिन्हें
खोलना आसान नहीं होता। चले जा
रहे हैं हम दो सीधी लकीरों में
दूर किसी अज्ञात क्षितिज
रेखा की ओर, हर एक
ख़्वाब की है
अपनी
ही
बेबसी कहीं ज़मीं और कहीं आसमान
नहीं होता। इक सुबह से, दूसरे
सुबह तक, अनगिनत
कहानियों का होता
आया है उदयांत,
कई बार
चाहा
भुला दें गुज़रा हुआ कल लेकिन हर
एक याद मेहमान नहीं होता। 
हज़ार बार टूटा ख़्वाहिशों
का शीशमहल, हर
एक टुकड़े में
थी अक्स
ए ज़िन्दगी,
ज़माना
गुज़र जाए शीशा ए दिल में उतरने
के लिए यूँ ही इश्क़ मेहरबान
नहीं होता।
- शांतनु सान्याल 

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past