Saturday, 26 January 2019

राज़ ए तलाश - -

आईना भी वही, अक्स भी वही,
फिर हैरानगी कैसी, वो कोई
गुमशुदा ख़्वाब है, या
ढलती धूप की
तपन,
अहाता भी वही, घर भी वही, -
फिर आवारगी कैसी।
ताउम्र का
अहदनामा शायद अब तुम्हारे
पास नहीं, रास्ता वही,
ठिकाना भी वही,
फिर
नाराज़गी कैसी। अक्सर मैं, -
ख़ुद से सवाल करता हूँ
लाजवाब हो कर,
जो वजूद
में नहीं,
उसके लिए फिर दीवानगी कैसी।

* *
- शांतनु सान्याल
 

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