शनिवार, 23 जुलाई 2016

कभी हो सके तो आओ -

ज़िन्दगी की ज्यामिति
इतनी भी मुश्किल
नहीं कि जिसे
ढूंढे हम,
हाथ
की लकीरों में। तुम्हारे
शहर में यूँ तो हर
चीज़ है ग़ैर
मामूली,
मगर
अपना दिल लगता है
सिर्फ फ़क़ीरों में।
कभी हो सके
तो आओ
यूँ ही
नंगे पांव चलके मेरी
दुनिया है बसी,
बिन पाँव के
शहतीरों
में।

* *
- शांतनु सान्याल

2 टिप्‍पणियां:

  1. शांतनु जी, जितना आपको पढ़ा है उतना सीखा भी है, सरलता, सादगी से रची भावपूर्ण रचना मन को छू गयी 👌👌👌🙏🙏💐💐

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