Saturday, 9 June 2018

ऐनक के इस पार - -

दूर तक वही बियाबां, वही अंतहीन शून्यता,
प्रतिध्वनियों का इंतज़ार अब बेमानी है,
जो कभी था चिड़ियों के कलरव 
से आबाद, वो गूलर का पेड़
अब किताबों की कहानी
है। कंक्रीट के जंगल
में उड़ान पुल के
सिवा कुछ
भी नहीं,
सभी रिश्तों के जिल्द हैं ख़ूबसूरत, लेकिन -
अंदर से महज मुँह ज़ुबानी है। कोई नहीं
पढ़ता दिल की किताब, शायद
आजकल, सभी को वक़्त
न मिलने की, बहुत
परेशानी है।
ऐनक के
उस  पार दुनिया अपनी जगह झिलमिलाती
सी नज़र आए, ऐनक के इस पार सिर्फ़
पानी ही पानी है।

* *
- शांतनु सान्याल