मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

अभ्यंतर कस्तूरी - -

किस मोह में है धावित माया मृग,
खोजता है जीवन, स्वयं के
अंदर स्वयं की ही
प्रतिच्छाया,
किस
लिए इतनी पिपासा, किस मरुधरा
में हैं घनीभूत, सभी भ्रामक
मृग तृष्णा, सहसा
उठें रेत के
झंझा,
सांध्य आकाश में बुझ जाए ध्रुव - -
तारा, किस लिए अमरत्व
की चाह, माटी से है
उद्गम, माटी में
ही मिल
जाए
तथाकथित स्वर्णिम काया, किस
लिए ढूंढता है जीवन, स्वयं
के अंदर स्वयं की ही
प्रतिच्छाया।
पश्चिम
की
ओर विलीन हुए भ्रमणकारी दल  
लेकर नील आकाश का
शामियाना, सांद्र
तिमिर के
अंदर,
मैं
खोजता हूँ उसकी प्राणदायिनी -
मृदु स्मित में, केवल एक
रात का ठिकाना,
नभ विहीन
सृष्टि
में
भरना चाहता हूँ, उसके आँखों से
टपकते आलोक पुञ्ज,
अधर के कुछ
अमिय
बिंदु,
सीने का पवित्र दहन, सृजनकारी
आलिंगन, निःश्वासों के मधु
गंध कोष, सिक्त माटी
का शरीर लिए महा
समर्पण, उस
अदृश्य
चाक
के भीतर पुनर्प्रवेश, उस प्राणेश
के हाथों पुनर्गठन, फिर
जागृत हों सुप्त
जीवन के
कुछ
निष्क्रिय मुहूर्त, जिनमें जीवन का
अर्थ है समाया, तलाश करे
जीवन, कुछ विस्मृत
दिगंत की नव
प्रतिच्छाया।

* *
- - शांतनु सान्याल



12 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 08 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (09-12-2020) को "पेड़ जड़ से हिला दिया तुमने"  (चर्चा अंक- 3910)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  3. बहुत ही सुंदर सराहनीय अभिव्यक्ति सर हमेशा की तरह।
    सादर

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