बुधवार, 23 दिसंबर 2020

शून्य समुद्र - -

हर एक विध्वंस के पश्चात, खुलते
हैं सङ्घ के कपाट, नील नद
से कलिंग तक, उत्थान
पतन है सृष्टि का
अवदान, मृत्यु
तट से ही
होता
है
जन्मोदय, हर एक रात के गर्भ में
है अवस्थित, उस आलोकमय
संस्कृति का मूल स्थान।
असंख्य भूमिगत
नगर प्रांतर
समय के
सीने
में
हैं निमग्न, बहु बार टूटे साम्राज्य
असंख्य, अनेकों बार पुनः
नवीन विस्मय हुए
आविर्भूत, नहीं
बुझती कभी
जीवन
की
प्यास, शताब्दियों से, अंदर बाहर
निरंतर चलता रहता है, गहरा
उत्खनन। बुज़ुर्ग पृथ्वी का
प्रदाह सीना, कभी नहीं
बुझता, चिरंतन
यहाँ नहीं
किसी
का
भी निवास, प्रेम घृणा, हिंसा करुणा,
व्यय संचय, अपने पराए सब
हो जाएंगे एक दिन स्मृति
जीवाश्म, संघ बिखर
कर रचेगा फिर
एक अभिनव
इतिहास,
हम
कहाँ, किस जगह, किस रूप में होंगे
किसी को कुछ भी नहीं पता,
कदाचित, सिर्फ़ शून्य ही
शून्य हो, तब हमारे
आसपास।

* *
- - शांतनु सान्याल

 
     
 
 

20 टिप्‍पणियां:

  1. सृष्टि में शून्य भी पूर्ण है।
    सभ्यताओं के भग्नावशेष साक्षी हैं
    कर्म ने ही इतिहास रचा है।
    गहन विचाराभिव्यक्ति।
    सादर प्रणाम सर।

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  2. अनेकों बार पुनः
    नवीन विस्मय हुए
    आविर्भूत, नहीं
    बुझती कभी
    जीवन
    की
    प्यास, शताब्दियों से, अंदर बाहर
    निरंतर चलता रहता है, गहरा
    उत्खनन..गहरी अनुभूति को परिभाषित करती सुन्दर रचना..

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  3. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज बुधवार 23 दिसंबर 2020 को साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  4. बहुत सुन्दर..."विध्वंशों के बाद नया निर्माण सामने आता"

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  5. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 24.12.2020 को चर्चा मंच पर दिया जाएगा| आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ाएगी
    धन्यवाद

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  6. सिर्फ शून्य ही अंततः जीवन का उद्देश्य बन जाता है।

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  7. एक अभिनव इतिहास के शायद हम भी हिस्सा बन सकें। सुंदर चिंतन। ।।। साधुवाद व शुभ-कामनाएँ

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  8. बुज़ुर्ग पृथ्वी का
    प्रदाह सीना, कभी नहीं
    बुझता, चिरंतन

    बहुत श्रेष्ठ सुंदर रचना....

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