Saturday, 27 June 2015

राह ए हक़ में - -

हर इक नज़र को
है किसी न
किसी
की तलाश,कभी
कोई भटके है
धुंधभरी
वादियों में दर
बदर, कभी
कोई
मिल जाए यूँ ही
दहलीज़ के
आसपास।
फ़रेब ए नज़र है
बाशक्ल ओ
बेशक्ल
के दरमियां, राह
ए हक़ में
लेकिन
न कोई आम, न
कोई ख़ास।

* *
- शांतनु सान्याल
 http://sanyalsduniya2.blogspot.in/
art of paul landry

3 comments:

  1. सुन्दर रचना
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है
    www.manojbijnori12.blogspot.com

    ReplyDelete
  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (28-06-2015) को "यूं ही चलती रहे कहानी..." (चर्चा अंक-2020) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

    ReplyDelete
  3. क्या बात है.... बहुत ही अच्छी प्रस्तुती

    ReplyDelete

अतीत के पृष्ठों से - -