07 जनवरी, 2021

कुछ देर ठहर के देखेंगे - -

कहते हैं कि उस के पास है, कोई कल्प तरु,
उस के साए में हम कुछ देर ठहर के देखेंगे।

इक बार जो देख ले, दोनों जहाँ से तर जाए,
समुद्र से भी गहन, आँखों में उतर के देखेंगे।

उसके हाथों से बहते हैं, दुआओं के जलधार,
विस्तीर्ण बबूल वन से, हम गुज़र के देखेंगे।

ये सच है, कि मंज़िल का पता नहीं जानते,
अकेले ही सही, अनंत सफ़र कर के देखेंगे।

कब तक आईना, यूँ चुराएगा हम से नज़र,
हम अक्स अपना फिर बन संवर के देखेंगे।

अंदर तक हैं सब्ज़, क़दीम दरख़्त की शाख़ें,
मंदिर की सीढ़ियों में यूँ ही बिखर के देखेंगे।

वक़्त जितना भी उभारे, माथे की लकीरों को,
हम उतना ही टूट फूट कर, निखर के देखेंगे।  

* *
- - शांतनु सान्याल  
 

 

11 टिप्‍पणियां:

  1. कब तक आईना, यूँ चुराएगा हम से नज़र,
    हम अक्स अपना फिर बन संवर के देखेंगे..नायाब पंक्तियाँ..आशा का संदेश देती सुंदर रचना..

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