कोई ज़रूरी नहीं कि हर चीज़
का विनिमय हो, उधार ले
जाने वाले शख़्स से
पूर्व परिचय हो,
उसने जाते
हुए
मुझे कुछ यूँ देखा कि उसे मैं,
हद ए नज़र तक ख़ामोश
देखता ही रह गया,
आवश्यक
नहीं,
इस हार में उसकी विजय हो,
प्रयोजन जो भी हो उसने
मुझे इस्तेमाल
किया, सच
ये भी
है, कि मेरे बग़ैर जीना मुहाल
किया, वक़्त ही बताएगा
उसके दिल में जो भी
आशय हो, समय
का घिसाव
उतार
देता है गहनतम कलई, लाख
कोशिश कर ले कोई, चेहरा
ठीक होता नहीं, ज़रूरी
नहीं हर पतझड़ के
बाद मौसम
मधुमय
हो।
कोई ज़रूरी नहीं कि हर चीज़
का विनिमय
हो।
* *
- - शांतनु सान्याल
23 जनवरी, 2021
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past
-
नेपथ्य में कहीं खो गए सभी उन्मुक्त कंठ, अब तो क़दमबोसी का ज़माना है, कौन सुनेगा तेरी मेरी फ़रियाद - - मंचस्थ है द्रौपदी, हाथ जोड़े हुए, कौन उठेग...
-
मृत नदी के दोनों तट पर खड़े हैं निशाचर, सुदूर बांस वन में अग्नि रेखा सुलगती सी, कोई नहीं रखता यहाँ दीवार पार की ख़बर, नगर कीर्तन चलता रहता है ...
-
जिसे लोग बरगद समझते रहे, वो बहुत ही बौना निकला, दूर से देखो तो लगे हक़ीक़ी, छू के देखा तो खिलौना निकला, उसके तहरीरों - से बुझे जंगल की आग, दोब...
-
कुछ भी नहीं बदला हमारे दरमियां, वही कनखियों से देखने की अदा, वही इशारों की ज़बां, हाथ मिलाने की गर्मियां, बस दिलों में वो मिठास न रही, बिछुड़ ...
-
उम्र भर जिनसे की बातें वो आख़िर में पत्थर के दीवार निकले, ज़रा सी चोट से वो घबरा गए, इस देह से हम कई बार निकले, किसे दिखाते ज़ख़्मों के निशां, क...
-
तुम्हें संवारने की चाह में हज़ार बार उजड़ा है मेरे अंदर का उपवन, न जाने किन रास्तों से हो कर गुज़री है ज़िन्दगी, कभी वक़्त मिले तो देख लेना प्रणय...
-
शेष प्रहर के स्वप्न होते हैं बहुत - ही प्रवाही, मंत्रमुग्ध सीढ़ियों से ले जाते हैं पाताल में, कुछ अंतरंग माया, कुछ सम्मोहित छाया, प्रेम, ग्ला...
-
दो चाय की प्यालियां रखी हैं मेज़ के दो किनारे, पड़ी सी है बेसुध कोई मरू नदी दरमियां हमारे, तुम्हारे - ओंठों पे आ कर रुक जाती हैं मृगतृष्णा, पल...
-
कुछ स्मृतियां बसती हैं वीरान रेलवे स्टेशन में, गहन निस्तब्धता के बीच, कुछ निरीह स्वप्न नहीं छू पाते सुबह की पहली किरण, बहुत कुछ रहता है असमा...
-
ये हथेलियों की है ज्यामिति इसे समझना आसां नहीं, चाहता है दिल बहुत कुछ, कहने को बाक़ी अरमां नहीं। लब ए बाम पर, कई चिराग़ ए शाम लोग जलाए बैठे है...

सुन्दर भावपूर्ण अभिव्यक्ति..अप्रतिम सृजन ।
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंसुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंआपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" रविवार 24 जनवरी 2021 को साझा की गयी है.... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंवाह क्या खूब लिखा है आपने 👌
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंजरूरी नहीं कि हर पतझड़ के बाद मौसम मधुमय हो। बहुत खूब। बहुत बढ़िया। आपको बधाई। सादर।
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंसमय
जवाब देंहटाएंका घिसाव
उतार
देता है गहनतम कलई, लाख
कोशिश कर ले कोई, चेहरा
ठीक होता नहीं, ज़रूरी
नहीं हर पतझड़ के
बाद मौसम
मधुमय हो..सारगर्भित रचना मन में उतरती हुई..
दिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंसुंदर, भावपूर्ण रचना.
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएंसुंदर प्रस्तुति.
जवाब देंहटाएंदिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।
हटाएं