20 जनवरी, 2021

तरजीह के पैमाने - -

हर एक को ख़ुश करना बहुत
ही है मुश्किल, कहीं ख़्याल
मिल भी जाएँ, तो
आसां नहीं
तबियत
का
मिलना, इस मीनाबाज़ार में हैं,
हर चीज़ की आमद, चंद
सिक्कों के एवज
जिस्म ओ जां
है यहाँ
मय्यसर, लेकिन मुश्किल है -
बहोत, सिर्फ़ मुहोब्बत
का मिलना, वक़्त
नहीं रुकता
बहे
जाता है, सुदूर ढलानों से होकर
मुहानों के सिम्त, बड़ी
देर से हूँ मुख़ातिब,
क्यूँ आईना की
तरह देखते
हो मुझे
तुम,
कैसे समझाऊं, बहुत ही कठिन -
है, पुराने सूरत का मिलना,
हासिए की सीमाएं,
अब ढलते धूप
में बढ़ाने से
क्या
फ़ायदा, ज्वार के साथ भाटे का
रहना है स्वाभाविक, हर
शख़्स के फ़ेहरिस्त
में, तरजीह के
पैमाने एक
नहीं
होते, मुश्किल है हर एक दिल से
अहमियत का
मिलना।

* *
- - शांतनु सान्याल  





17 टिप्‍पणियां:

  1. हर
    शख़्स की फ़ेहरिस्त
    में, तरजीह के
    पैमाने एक
    नहीं
    होते, मुश्किल है हर एक दिल से
    अहमियत का
    मिलना।
    सत्य वचन ...जीवन के उतार-चढ़ाव , ऊँच-नीच का भान कराती सशक्त लेखनी है सर आपकी ! सदैव की भांति गहन चिंतन लिए सुन्दर सृजन ।

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  2. वाह...
    बहुत ख़ूब


    "मुश्किल है हर एक दिल से
    अहमियत का
    मिलना।"

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  3. जीवन दर्शन।
    बेहतरीन सृजन सर।
    सादर प्रणाम।

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  4. दिल की गहराइयों से शुक्रिया - - नमन सह।

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  5. कभी-कभी सभी को खुश करने के चक्कर में बहुतेरे नाखुश भी हो जाते हैं ! सच्चाई बयान करती रचना

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  6. हर एक को ख़ुश करना बहुत
    ही है मुश्किल, कहीं ख़्याल
    मिल भी जाएँ, तो
    आसां नहीं
    तबियत
    का
    मिलना

    बहुत खूब.....

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  7. जीवन की विसंगतियों के अजीब से मोह जाल को दर्शाती सार्थक रचना।
    सुंदर सृजन।

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