शताब्दियों से चल रहे हैं लोग उत्क्रांति
की ओर, आफ्रिका के गोचर भूमि
से निकल कर, शुष्क महा -
द्वीप से हो कर पृथ्वी
के अंतिम बिंदु
तक, फिर
भी
अपने अंदर के आईने में हम पाते हैं - -
अंधेरा घन घोर, शताब्दियों से
चल रहे हैं, लोग उत्क्रांति
की ओर। असमाप्त
ये रास्ता न जाने
किस शीर्ष
बिंदु
पर रुकेगा, अक्ष रेखा पर बिखरे पड़ें हैं
अनगिनत उम्मीद के बिम्ब, लहू -
लुहान कणों में, समय तलाश
करता है कोई अयाचित
अवतरण, जो रोक
पाए, मानवता
का अंतिम
क्षरण,
जिसके शिराओं में बहता हो सत्य का
रक्त पुरज़ोर, शताब्दियों से चल
रहे हैं लोग उत्क्रांति की
ओर।
* *
- - शांतनु सान्याल
30 मार्च, 2021
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
अतीत के पृष्ठों से - - Pages from Past
-
नेपथ्य में कहीं खो गए सभी उन्मुक्त कंठ, अब तो क़दमबोसी का ज़माना है, कौन सुनेगा तेरी मेरी फ़रियाद - - मंचस्थ है द्रौपदी, हाथ जोड़े हुए, कौन उठेग...
-
मृत नदी के दोनों तट पर खड़े हैं निशाचर, सुदूर बांस वन में अग्नि रेखा सुलगती सी, कोई नहीं रखता यहाँ दीवार पार की ख़बर, नगर कीर्तन चलता रहता है ...
-
जिसे लोग बरगद समझते रहे, वो बहुत ही बौना निकला, दूर से देखो तो लगे हक़ीक़ी, छू के देखा तो खिलौना निकला, उसके तहरीरों - से बुझे जंगल की आग, दोब...
-
कुछ भी नहीं बदला हमारे दरमियां, वही कनखियों से देखने की अदा, वही इशारों की ज़बां, हाथ मिलाने की गर्मियां, बस दिलों में वो मिठास न रही, बिछुड़ ...
-
उम्र भर जिनसे की बातें वो आख़िर में पत्थर के दीवार निकले, ज़रा सी चोट से वो घबरा गए, इस देह से हम कई बार निकले, किसे दिखाते ज़ख़्मों के निशां, क...
-
तुम्हें संवारने की चाह में हज़ार बार उजड़ा है मेरे अंदर का उपवन, न जाने किन रास्तों से हो कर गुज़री है ज़िन्दगी, कभी वक़्त मिले तो देख लेना प्रणय...
-
शेष प्रहर के स्वप्न होते हैं बहुत - ही प्रवाही, मंत्रमुग्ध सीढ़ियों से ले जाते हैं पाताल में, कुछ अंतरंग माया, कुछ सम्मोहित छाया, प्रेम, ग्ला...
-
दो चाय की प्यालियां रखी हैं मेज़ के दो किनारे, पड़ी सी है बेसुध कोई मरू नदी दरमियां हमारे, तुम्हारे - ओंठों पे आ कर रुक जाती हैं मृगतृष्णा, पल...
-
ये हथेलियों की है ज्यामिति इसे समझना आसां नहीं, चाहता है दिल बहुत कुछ, कहने को बाक़ी अरमां नहीं। लब ए बाम पर, कई चिराग़ ए शाम लोग जलाए बैठे है...
-
कुछ स्मृतियां बसती हैं वीरान रेलवे स्टेशन में, गहन निस्तब्धता के बीच, कुछ निरीह स्वप्न नहीं छू पाते सुबह की पहली किरण, बहुत कुछ रहता है असमा...

अपने अन्दर ही तो नहीं देख पाते लोग ... अच्छी प्रस्तुति .
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह। संगीता स्वरुप ( गीत )
हटाएंआपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज मंगलवार 30 मार्च 2021 शाम 5.00 बजे साझा की गई है.... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह। yashoda Agrawal
हटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'
जवाब देंहटाएंअति उत्तम, बहुत ही अच्छी रचना , सादर नमन होली की हार्दिक शुभकामनाएं, शुभ प्रभात
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह। ज्योति सिंह
हटाएंबहुत सुंदर सृजन है आपका।
जवाब देंहटाएंउत्क्रांति की बातें पर्याय: छलावा ही बन कर रह जाती है।
बहुत अभिनव विषय है।
साधुवाद।
आपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएंबहुत बहुत सुन्दर
जवाब देंहटाएंआपका ह्रदय तल से असंख्य आभार, नमन सह।
हटाएं