31 मार्च, 2025

अशेष तृष्णा - -

असमाप्त ही रहे अथाह गहराई में उतरने की
अभिलाषा, अदृश्य भोर की तरह तुम 
रहो मेरे बहुत नज़दीक, अंतहीन
संभावनाओं में कहीं पुनर्जन्म
की है आशा, अभी से न 
कहो अलविदा अभी
तो है शैशव -
कालीन
अंधकार, रात्रि को ज़रा पहुंचने दो वयःसंधि
पड़ाव के उस पार, संकुचित निशि पुष्प
के गंध कोषों में अभी तक है एक
अजीब सी   द्विधा, बिखरने
से पहले मधु संचय भी
ज़रूरी है, साँसों
में घुलने दो
सुरभित
स्पृहा,
सब कुछ आसानी से ग़र हो हासिल, तब -
समय से पहले मर जाती है जिज्ञासा,
असमाप्त ही रहे अथाह गहराई 
में उतरने की अभिलाषा ।
शब्दहीनता को बढ़ने
दो बंजर भूमि की
तरह दूर दूर
तक, मरु
उद्यान
की तलाश रहे अधूरा, जीवन न बने नीरस कुछ
और बढ़े जीने की अदम्य पिपासा, असमाप्त 
ही रहे अथाह गहराई में उतरने की
अभिलाषा ।।
- - शांतनु सान्याल

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