Friday, 8 March 2019

गन्धकोष - -

चाहे जितना भी अंतहीन साम्राज्य हो किसी का,
नियति के आगे असहाय, सभी एक समान,
सभी मुसाफ़िर एक ही पथ के, अज्ञात
भोर की ओर अग्रसर, एक ही
पांथनिवास में रात्रि
अवस्थान।
अनभिज्ञ सभी एक दूजे से, फिर भी अदृश्य नेह -
बंधन, कभी खिले भावनाओं में विरल हास -
परिहास, और कभी जीवन तट पर उठे
अशेष क्रंदन। किसे ख़बर कौन
देखे प्रथम, आख़री पहर
का तारक बिहान,
निशि पुष्पों
की है अपनी अलग मजबूरी, सुबह की आहट के 
साथ, सभी सुरभित कोषों का अवसान।
चाहे जितना भी अंतहीन साम्राज्य
हो किसी का, नियति के आगे
असहाय, सभी एक
समान।

* *
- शांतनु सान्याल

2 comments:

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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