Monday, 25 March 2019

अंतहीन प्रतीक्षा - -

उम्र से भी कहीं लम्बी है प्रतीक्षा, गली के
आख़री छोर में, कील ठोंकते हाथों को
आज भी है किसी का  इंतज़ार।
कहने को यूँ तो बहुत कुछ
बदल गया मेरे शहर
में, लेकिन अभी
तक है ज़िंदा,
अंधेरों का संसार। क्षितिज में फिर उभरी
हैं उम्मीद की किरण, शायद सुबह
का आलम हो कुछ ज्यादा ही
ख़ुशगवार। ख़्वाब देखते
हुए बूढ़ा जाती हैं
जहाँ जवां -
आँखें, कहाँ रुकता है किसी के लिए ये - -
ज़माने का कारोबार। जीवन स्रोत
को है बहना, हर पल, हर एक
लम्हा, ये और बात है कि
कभी तुम उस पार
और कभी
हम रहें  इस पार।  कहाँ रुकता है किसी के
लिए ये ज़माने का कारोबार।

* *
- शांतनु सान्याल

6 comments:

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल मंगलवार (26-03-2019) को "कलम बीमार है" (चर्चा अंक-3286) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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  3. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विद्यार्थी जी को याद करते हुए ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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