Wednesday, 27 March 2019

हिय के अंदर - -

कदाचित मरुधरा है हिय के अंदर, अनवरत -
प्यास जगाए, ख़ानाबदोश हो कर भी
मेरी दुनिया, तुम्हीं तक आ कर,
न जाने क्यों रुकना चाहें।
इक अजीब सा मोह
है, तुम्हारे सजल
नयन के
कोर,
अलस दुपहरी में जैसे बरगद की जटाएँ, सूखती
नदी को छूना चाहें। बहोत मुश्किल है, इन
हथेलियों के अंकगणित को समझना,
जो कुछ भी हो हासिल, इस पल
की मेहरबानी है, जो खो
गया, सो खो गया,
हम क्यों न
उसे भूलना
चाहें। ख़ानाबदोश हो कर भी मेरी दुनिया, तुम्हीं
तक आ कर, न जाने क्यों रुकना चाहें। 

* *
- शांतनु सान्याल






14 comments:

  1. बहुत खूब ,लाजबाब ...

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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  3. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" गुरूवार 28 मार्च 2019 को साझा की गई है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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  4. वाह बहुत खूबसूरत रचना।

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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  5. बहुत सुन्दर...

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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  6. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन अब अंतरिक्ष तक सर्जिकल स्ट्राइक करने में सक्षम... ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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  7. ख़ानाबदोश हो कर भी मेरी दुनिया, तुम्हीं
    तक आ कर, न जाने क्यों रुकना चाहें।
    बहुत खूबसूरत अभिव्यक्ति।

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    1. असंख्य धन्यवाद - - नमन सह।

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