Thursday, 11 April 2019

पलातक - -

कब तक यूँ ही फ़रारी का स्वांग रचोगे,
आईने के सामने हर शख़्स है, इक
अदद नंगा सच, चाहे जितना
भी पहन लो रंग गेरुआ,
सिद्धार्थ फिर भी
क्या बन
सकोगे। नियति की ज्यामिति में, क्या
राजा, क्या रंक, हर कोई है बंधा
निमिष मात्र से, अदृश्य -
प्रहार से चाह कर
भी बच न
सकोगे। कुछ बूंद मेरी निगाह के, कुछ 
नूर तेरी चाह के, बहुत कुछ हैं ये
ज़िन्दगी के लिए, चाहतों का
क्या आसमान भी कम
सा लगे है, चार
दिन की है
चांदनी,
उम्र भर इन्हें सहेज कर कहाँ रखोगे। - -
चाहे जितना भी पहन लो रंग
गेरुआ, सिद्धार्थ फिर भी
क्या बन सकोगे।
* *
- शांतनु सान्याल  
 

12 comments:

  1. बहुत सुंदर रचना

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    1. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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  2. जी नमस्ते,
    आपकी लिखी रचना शुक्रवार १२ अप्रैल २०१९ के लिए साझा की गयी है
    पांच लिंकों का आनंद पर...
    आप भी सादर आमंत्रित हैं...धन्यवाद।

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    1. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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  3. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (13-04-2019) को " बैशाखी की धूम " (चर्चा अंक-3304) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    - अनीता सैनी

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    1. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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  4. वाह!!!
    बहुत लाजवाब..।

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    1. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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  5. वाह बहुत लाजवाब सार्थक रचना

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    1. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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  6. उम्र भर इन्हें सहेज कर कहाँ रखोगे। - -
    चाहे जितना भी पहन लो रंग
    गेरुआ, सिद्धार्थ फिर भी
    क्या बन सकोगे।
    बहुत सुंदर ,सादर नमस्कार आप को

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    1. असंख्य धन्यवाद आदरणीय मित्र - - नमन सह।

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