Thursday, 1 March 2018

रंग ज़ाफ़रानी - -

फीके थे तमाम रंग दुनिया के, शाम
ढले अपने आप उतर गए, कोई
ख़्वाब था आख़री पहर वाला
या निगाहों में तैरती
मृगजल की बूंदे,
साथ तो
चले थे सभी, लेकिन सुबह से पहले -
न जाने लोग किधर गए। बहुत
सहेज कर रखा था तुम्हारा
वही बंद, पुरअसरार
लिफ़ाफ़ा, लेकिन
खोलते ही,
तमाम रंगे ज़ाफ़रानी हवाओं में बिखर
गए। राज़ ए ख़ामोशी रहने दे यूँ ही
गुमशुदा, निगाह की वादियों
में ऐ दोस्त, खिल उठे
हज़ार ख़्वाहिश
तुम्हारे
क़दम जिधर गए। फीके थे तमाम रंग
दुनिया के, शाम ढले अपने आप
उतर गए - -

* *
- शांतनु सान्याल

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