कूच कर गए हैं, तारे न जाने किस
दिगंत की ओर, ठहरे हुए से हैं
शून्य में ख़्वाबों के झूले,
सिर्फ़ ओस की कुछ
बूंदें हैं, बिखरे
हुए ज़मीं
पर
बेतरतीब, इक अहसास कि जी रहे
हैं, न कोई दूर है, न ही बहोत
क़रीब। वो अंजुमन ही न
रहा जहाँ से निकलते
रहे, कहकशां के
रास्ते, अब
चार
दीवारों में बंद है दिवाली, कोई अब
इंतज़ार नहीं करता, किसी
और के वास्ते। किसी
के पास है धमाका -
ख़ेज़ ख़ुशियाँ,
और कोई
करता
है
राख में तलाश, चाँदनी रात की, न
जाने कितने घरों में अभी तक
है मुसलसल अमावस,
कोई नहीं रखता
ख़बर इस
बात
की, राख में करते हैं तलाश चाँदनी
रात की।
* *
- - शांतनु सान्याल

सुन्दर सृजन
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
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