24 नवंबर, 2020

बदलाव ज़रूरी है - -

मिट्टी से गढ़ा अस्तित्व, चंद
काग़ज़ों में यहाँ बिक
जाए, ज़िन्दगी
कभी गुम
होती
नहीं, कि उसे खोजा जाए, वो
सिर्फ़ हाथ बदल होती है,
ये दिगर बात है कि
कोई, मेरे माथे
पर बद -
दुआ
की इबारत लिख जाए, कुछ
लोग हर मोड़ पर कुछ
नया तलाश करने
में रहते हैं
व्यस्त,
कुछ
मेरी तरह होते हैं पुरातन से -
आसक्त, ज़रूरी नहीं
कोई एक लम्बे
सफ़र के
लिए
मेरे हमराह टिक जाए, तुम
अपने अंदर ही अंदर
चाहे जितना भी
बिखरो रोज़,
कोई
नहीं करेगा तुम्हारी खोज - -
दरअसल, ये ग़लत -
फ़हमी है कि लोग
याद नहीं
करते,
प्रयोजन शेष तो किस बात की
है मुलाक़ात, तुम चाहो तो
करो याद, कदाचित
चलते चलते वो
शख़्स तुम्हें
दिख
जाए, मैं कभी भी नहीं बदला -
हाँ, वक़्त के साथ थोड़ा
अपडेट हो चला हूँ,
कि फिर कोई
न मेरे माथे
पर,
अस्वीकृत कविता की अनबूझ
पंक्तियाँ लिख जाए - -

* *
- - शांतनु सान्याल  
 

 

 





10 टिप्‍पणियां:

  1. हाँ, वक़्त के साथ थोड़ा
    अपडेट हो चला हूँ,
    कि फिर कोई
    न मेरे माथे
    पर,
    अस्वीकृत कविता की अनबूझ
    पंक्तियाँ लिख जाए - -गहन भाव लिए मन को छूता बहुत ही सुन्दर सृजन।

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  2. तुम
    अपने अंदर ही अंदर
    चाहे जितना भी
    बिखरो रोज़,
    कोई
    नहीं करेगा तुम्हारी खोज - -
    दरअसल, ये ग़लत -
    फ़हमी है कि लोग
    याद नहीं
    करते,..........सही बात, सुन्दर सृजन !

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  3. तुम
    अपने अंदर ही अंदर
    चाहे जितना भी
    बिखरो रोज़,
    कोई
    नहीं करेगा तुम्हारी खोज - -बहुत ही कहा है आपने..मनोभावों की सुंदर अभिव्यक्ति...।

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