ज़िन्दगी का सिक्का उछलता रहा
नियति के हाथ, कभी हम
खड़े थे, वृद्ध शिरीष के
नीचे एक साथ,
और कभी
थे हम
बंदी, छद्मवेशी समय के हाथ, अभी
तक सूख रहे हैं कुछ जलरंग
छवि, स्मृति के छतों में,
जिन्हें हम छोड़ गए
उनके भाग्य के
साथ, अभी
तक
हैं झूलते हुए कुछ पतंग के ढांचे - -
आसां नहीं पिछला पहर भूल
जाना, न जाने कितनी
ख़ूबसूरत वादियों से
मिले, कितने ही
विशालकाय
नदियों
के
मुहानों से बात की, सागर तट से
उठाए सीपों के आलोकित
रूह, बहुत कोशिशें की
लेकिन मुश्किल
था पहला
सफ़र
भूल
जाना, आसां नहीं पुराना घर भूल
जाना।
* *
- - शांतनु सान्याल

"आसां नहीं पुराना घर भूल जाना" ये बहुत बड़ा सत्य है , इसको नकारा नहीं जा सकता है।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर सृजन!
हार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएं
जवाब देंहटाएंजय मां हाटेशवरी.......
आप को बताते हुए हर्ष हो रहा है......
आप की इस रचना का लिंक भी......
08/11/2020 रविवार को......
पांच लिंकों का आनंद ब्लौग पर.....
शामिल किया गया है.....
आप भी इस हलचल में. .....
सादर आमंत्रित है......
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धन्यवाद
हार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंसागर तट से उठाए सीपों के आलोकित रूह,
जवाब देंहटाएंबहुत कोशिशें की
लेकिन मुश्किल था पहला सफ़र भूल जाना,
आसां नहीं पुराना घर भूल जाना।
बहुत बढ़िया कविता
साधुवाद 🙏
सादर,
डॉ. वर्षा सिंह
हार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंBahut hi Sundar laga.. Thanks..
जवाब देंहटाएंदिवाली पर निबंध Diwali Essay in Hindi
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हार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंसुन्दर
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
हटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह ।
जवाब देंहटाएंबहुत ही सुंदर सृजन सर।
जवाब देंहटाएंहार्दिक आभार - - नमन सह।
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